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Dasha Mata Vrat 2024: दशा माता व्रत आज, जानिए पूजाविधि, महत्व और कथा

Thu, 04 Apr 2024 10:29 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Thu, 04 Apr 2024 10:29 AM IST
सार

दशामाता की पूजा का पर्व 4 अप्रैल को है। इस दिन दशा माता की कथा पढ़ने से दस गुना अधिक फल मिलता है।

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dasha mata vrat 2024 puja vidhi katha importance and significance of dasha mata puja
दशा माता व्रत 2024

विस्तार

चैत्र मास की दशमी तिथि को दशा माता का पर्व मनाया जाता है। इस बार दशामाता की पूजा का पर्व 4 अप्रैल को है। इस दिन दशा माता की कथा पढ़ने से दस गुना अधिक फल मिलता है। मान्यता है कि दशा माता की पूजा और कथा पढ़ने से घर में सुख समृद्धि आती है,परिवार के सदस्यों की ग्रह दशा ठीक रहती है।
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कौन हैं दशा माता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दशा माता मां पार्वती का ही स्वरूप है। दशा माता का व्रत, घर-परिवार के बिगड़े ग्रहों की दशा और परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाएं पूजा और व्रत करके गले में एक खास डोरा (पूजा का धागा) पहनती है ताकि परिवार में सुख-समृद्धि, शांति, सौभाग्य और धन संपत्ति बनी रहे। महिलाएं इस दिन दशा माता और पीपल की पूजा कर सौभाग्य, ऐश्वर्य, सुख-शांति और अच्छी सेहत की कामना करती हैं।
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पूजाविधि
इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु के स्वरूप पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन सौभाग्यवती महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार का डोरा बनाकर उसमें 10 गांठ लगाती हैं,उसे हल्दी से रंगती हैं और पीपल वृक्ष की प्रदक्षिणा करते उसकी पूजा करती हैं। पूजा करने के बाद वृक्ष के नीचे बैठकर नल-दमयंती की कथा सुनती हैं। इसके बाद परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करते हुए डोरा गले में बांधती हैं। घर आकर द्वार के दोनों हल्दी कुमकुम के छापे लगाती है। इस दिन एक समय भोजन किया जाता है। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है।
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दशा माता व्रत की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय राजा नल और रानी दमयंती सुखपूर्वक राज्य करते थे। एक दिन रानी दमयंती ने दशा माता का व्रत किया और डोरा अपने गले में बांधा। राजा ने जब ये देखा तो उन्होंने वो डोरा निकालकर फेंक दिया। उसी रात दशा माता एक बुढ़िया के रूप में राजा के सपने में आई और कहा कि “तेरी अच्छी दशा जा रही है और बुरी दशा आ रही है। तूने मेरा अपमान किया है।”इस घटना के कुछ दिन बाद में राजा की दशा इतनी बुरी हो गई कि उसे अपना राज्य छोड़कर दूसरे राज्य में काम के लिए जाना पड़ा। यहां तक उन पर चोरी का आरोप भी लगा। एक दिन वन से गुजरते समय राजा नल को वही सपने वाली बुढि़या दिखाई दी तो वे उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे और बोले “माई मुझसे भूल हुई क्षमा करो। मैं पत्नी सहित दशामाता का पूजन करूंगा।”

बुढि़या ने उन्हें क्षमा करते हुए दशामाता का पूजन करने की विधि बताई। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि आने पर राजा-रानी ने अपनी सामर्थ्य अनुसार दशामाता का पूजन किया और दशामाता का डोरा गले में बांधा। इससे उनकी दशा सुधरी और राजा को पुनः अपना राज्य मिल गया। इसलिए सभी को श्रद्धापूर्वक मां दशाा माता की पूजा करनी चाहिए और स्त्रियों को कथा-पूजन कर डोरा धारण करना चाहिए। 


दशा माता पूजा शुभ मुहूर्त 
इस वर्ष 4 अप्रैल को दशा माता व्रत की पूजा-अर्चना की जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 29 मिनट से लेकर 08 बजकर 2 मिनट तक रहेगा, फिर इसके बाद 11 बजकर 8 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 46 मिनट पर महिलाएं दशा माता की पूजा-अर्चना कर सकती हैं। 
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