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Anant Chaturdashi 2020: ऐसे रखें अनंत चतुर्दशी का व्रत, जानिए पूजा विधि और कथा

Mon, 31 Aug 2020 05:35 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन
अनीता जैन Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 31 Aug 2020 05:35 AM IST
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anant chaturdashi 2020 date shubh muhurat puja timing puja vidhi and katha
अनंत चतुर्दशी 2020

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर अंनत चतुर्दशी का व्रत रखा जाता है। इस तिथि पर गणेश विसर्जन की भी परंपरा है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शास्त्रों में व्रत रखने के साथ ही भगवान विष्णु के अनंत स्वरुप की पूजा का विधान है। अनंत यानि जिसका न आदि का पता है और न ही अंत का अर्थात जगत के पालनहार भगवान श्री नारायण। शास्त्रों के अनुसार अंनत भगवान विष्णु का ही स्वरुप हैं,अतः अनंत चतुर्दशी को विधि-विधान से व्रत एवं पूजन-अर्चना करने से समस्त संकट समाप्त हो जाते हैं। इस व्रत में एक समय बिना नमक के भोजन किया जाता हैं,फलाहार भी कर सकते हैं।

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रक्षा कवच हैं अनंत सूत्र
अनंत चतुर्दशी की पूजा में सूत्र का बड़ा महत्व है। यह अनंत सूत्र शुद्ध रेशम या कपास के सूत के धागे को हल्दी में भिगोकर 14 गाँठ लगाकर तैयार किया जाता है। इसे हाथ या गले में  ध्यान करते हुए धारण किया जाता है। हर गाँठ में श्री नारायण के विभिन्न नामों से पूजा की जाती है। पहले में अनंत, श्री अनंत भगवान का  पहले में अनंत,उसके बाद ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव,वैकुण्ठ,श्रीधर,त्रिविक्रम,मधुसूदन,वामन,केशव,नारायण,दामोदर,और गोविन्द की पूजा होती है।
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मान्यता है कि इस अनंत सूत्र को बांधने से व्यक्ति प्रत्येक कष्ट से दूर रहता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक इस दिन श्री हरि की पूजा करता है उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है। इस दिन गणेश विसर्जन भी किया जाता है जिसके चलते इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
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ऐसे करें पूजा
इस दिन कलश स्थापना करके उस पर सुंदर लोटे में कुश रखना चाहिए। यदि कुश उपलब्ध न हो तो दूब रख सकते हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने केसर,रोली और हल्दी से रंगे हुए सूत के डोरे रखकर उनकी गंगाजल, गंध, पुष्प, अक्षत, धूप-दीप आदि से पूजा करें। मिष्ठान आदि का भोग लगाएं एवं अनंत भगवान का ध्यान करते हुए सूत्र धारण करें। यह डोरा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देने वाला माना गया है। इस दिन श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करना बहुत उत्तम माना जाता है। भगवान विष्णु की कृपा के लिए श्री सत्यनारायण की कथा करना बहुत लाभकारी है।

अनंत सूत्र बांधने का मंत्र -
अनंत संसार महासमुद्रे
मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनंतरूपे विनियोजयस्व
ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते।।

अनंत भगवान की कथा
मान्यता के अनुसार वशिष्ठ गोत्री सुमंत नामक एक ब्राह्मण थे,जिनका विवाह महर्षि भृगु की पुत्री दीक्षा से हुआ,इनकी पुत्री थी शीला। पत्नी की मृत्यु के उपरांत सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया और सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई के समय कर्कशा ने दामाद को भोजन से बचे हुए पदार्थों को पाथेय के रूप में दिया। कौंडिन्य ऋषि अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर निकल पड़े। मार्ग में ही शाम ढलने लग गई और ऋषि नदी के किनारे संध्या वंदन करने लगे। 

इसी दौरान सुशीला ने देखा कि बहुत सारी महिलाएं किसी देवता की पूजा कर रही थीं। सुशीला ने महिलाओं से पूछा कि वे किसकी प्रार्थना कर रही हैं, इस पर उन लोगों ने उन्हें भगवान अनंत की पूजा करने और इस दिन उनका व्रत रखने के महत्व के बारे में बताया। व्रत के महत्व के बारे में सुनने के बाद सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उन्होंने सारी बात बता दी। कौंडिन्य ने यह सब कुछ मानने से मना कर दिया और पवित्र धागे को निकालकर अग्नि में डाल दिया। इसके बाद उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वह दुखी रहने लगे। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कही। 


 

पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े।तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले, "हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा।अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। 14 वर्षों तक व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे''। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई। एक अन्य कथा के अनुसार श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का 14 वर्षों तक विधिपूर्वक व्रत किया और इसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए व चिरकाल तक राज्य करते रहे। इसके बाद ही अनंत चतुर्दशी का व्रत प्रचलन में आया।

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