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कहता था घर आउंगा, आएगी लाश
गुरदासपुर ।
Updated Thu, 10 Jul 2014 10:24 PM IST
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वह कहता था कि मैं सुरक्षित हूं और जल्द सकुशल घर लौटूंगा, लेकिन अब उसकी लाश ही घर आएगी। यह कहना है कि रोजगार के सिलसिले में इराक गए जिले के गांव जीवननंगल निवासी 19 वर्षीय शमशेर सिंह के पिता सुच्चा सिंह का। वतन वापसी के दौरान हुई शमशेर सिंह की मौत की खबर से उसके घर ही नहीं बल्की पूरे जीवननंगल गांव में मातम का माहौल है।
शमशेर सिंह की मौत से इराक से उसके सुरक्षित घर वापसी की आस भी धरी रह गई। लौटते वक्त 19 वर्षीय शमशेर की दुबई के अस्पताल में हुई मौत के बाद पिता सुच्चा सिंह ने कहा कि वतन वापसी के दौरान बीच यात्रा में तबीयत बिगड़ने के बावजूद पर्याप्त मेडिकल सहायता उपलब्ध न होने के कारण ही शमशेर सिंह की जान गई ।
सुच्चा सिंह ने बताया कि उनके बेटे को यदि समय से उचित उपचार की सुविधा मिलती तो शायद आज वह जिंदा होता। वह 25 फरवरी को इराक गया था। जब इराक में हालात बदतर हुए तो उसने वापस भारत लौटना ही मुनासिब समझा। अन्य भारतीयों के साथ वह 22 जून को इराक से चला था।
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अचानक रास्ते में उसकी तबीयत खराब हो गई। ऐसे में 23 जून को उसे दुबई के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान परिजनों से फोन पर उसकी आखिरी बातचीत आठ जुलाई को हुई थी। इसके बाद बुधवार को उसकी मौत की खबर आई। उसके पिता को फोन पर बताया कि कि शमशेर सिंह की इलाज के दौरान अस्पताल में ही मौत हो गई है।
पिता ने बताया कि इराक में रहने के दौरान ही शमशेर सिंह की तबीयत कुछ खराब हुई थी। उस दौरान वहां गृह युद्ध की स्थिति में दुकानें और बाजार बंद थे। इलाज की सुविधाएं भी नहीं मिल रही थीं। यही वजह था कि शमशेर बीमार हालात में ही 22 जून को इराक से भारत के लिए चल पड़ा, लेकिन बीच यात्रा में ही उसकी हालत नाजुक हो गई । ऐसे में 23 जून को उसे दुबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इतने दिनों में उनकी अपने बेटे से मात्र एक बार मंगलवार को ही बात हुई। शमशेर सिंह इराक स्थित नजफ की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में बतौर पेंटर काम करना था। गरीबी के बावजूद 1.5 लाख का कर्ज लेकर परिजनों ने से इराक भेजा था, लेकिन अब उन्हें शमशेर के पार्थिव शरीर का इंतजार है।
शमशेर सिंह की मां शरणजीत कौर ने बताया कि शमशेर सिंह के अलावा उसके दो और बेटे हैं। वे अभी छोटे हैं। शमशेर की पहली तनख्वाह तो कंपनी ने सिक्योरिटी के तौर पर रख ली थी। जब शमशेर ने अपनी दूसरी तनख्वाह मिलने के बाद 11,198 रुपये घर भेजे तो उसे उन्होंने एक धार्मिक स्थान पर भेंट कर दिया। इसके बाद शमशेर ने कोई रकम घर नहीं भेजा।
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शमशेर सिंह की मौत से इराक से उसके सुरक्षित घर वापसी की आस भी धरी रह गई। लौटते वक्त 19 वर्षीय शमशेर की दुबई के अस्पताल में हुई मौत के बाद पिता सुच्चा सिंह ने कहा कि वतन वापसी के दौरान बीच यात्रा में तबीयत बिगड़ने के बावजूद पर्याप्त मेडिकल सहायता उपलब्ध न होने के कारण ही शमशेर सिंह की जान गई ।
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सुच्चा सिंह ने बताया कि उनके बेटे को यदि समय से उचित उपचार की सुविधा मिलती तो शायद आज वह जिंदा होता। वह 25 फरवरी को इराक गया था। जब इराक में हालात बदतर हुए तो उसने वापस भारत लौटना ही मुनासिब समझा। अन्य भारतीयों के साथ वह 22 जून को इराक से चला था।
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अचानक रास्ते में उसकी तबीयत खराब हो गई। ऐसे में 23 जून को उसे दुबई के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इलाज के दौरान परिजनों से फोन पर उसकी आखिरी बातचीत आठ जुलाई को हुई थी। इसके बाद बुधवार को उसकी मौत की खबर आई। उसके पिता को फोन पर बताया कि कि शमशेर सिंह की इलाज के दौरान अस्पताल में ही मौत हो गई है।
पिता ने बताया कि इराक में रहने के दौरान ही शमशेर सिंह की तबीयत कुछ खराब हुई थी। उस दौरान वहां गृह युद्ध की स्थिति में दुकानें और बाजार बंद थे। इलाज की सुविधाएं भी नहीं मिल रही थीं। यही वजह था कि शमशेर बीमार हालात में ही 22 जून को इराक से भारत के लिए चल पड़ा, लेकिन बीच यात्रा में ही उसकी हालत नाजुक हो गई । ऐसे में 23 जून को उसे दुबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया।
इतने दिनों में उनकी अपने बेटे से मात्र एक बार मंगलवार को ही बात हुई। शमशेर सिंह इराक स्थित नजफ की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में बतौर पेंटर काम करना था। गरीबी के बावजूद 1.5 लाख का कर्ज लेकर परिजनों ने से इराक भेजा था, लेकिन अब उन्हें शमशेर के पार्थिव शरीर का इंतजार है।
शमशेर सिंह की मां शरणजीत कौर ने बताया कि शमशेर सिंह के अलावा उसके दो और बेटे हैं। वे अभी छोटे हैं। शमशेर की पहली तनख्वाह तो कंपनी ने सिक्योरिटी के तौर पर रख ली थी। जब शमशेर ने अपनी दूसरी तनख्वाह मिलने के बाद 11,198 रुपये घर भेजे तो उसे उन्होंने एक धार्मिक स्थान पर भेंट कर दिया। इसके बाद शमशेर ने कोई रकम घर नहीं भेजा।