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बुंगल में रॉकेट लांचर मिलने से सनसनी
अमर उजाला, पठानकोट
Updated Sun, 12 Jan 2014 10:25 PM IST
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एशिया की दूसरी सबसे बड़ी ममून छावनी की दीवार से महज 15 मीटर दूर गांव बुंगल में जिंदा रॉकेट लांचर मिलने से सनसनी फैल गई है।
सेना की टीम ने सुरक्षा के बीच रॉकेट लांचर को कब्जे में लेकर उसे निष्क्रिय कर दिया। घटना से छावनी की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
फिलहाल पता नहीं चल पाया है कि रॉकेट लांचर सेना का है या बाहर से लाया गया है। सेना भी इस बारे में कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
जानकारी के अनुसार शनिवार देर शाम बुंगल निवासी अमीर चंद पुत्र खजाना चंद अपने मकान के पीछे पेड़ की टहनियां काट रहे थे।
इसी दौरान जमीन से झाड़ काटते समय उनकी कुल्हाड़ी किसी लोहे की चीज से टकराई। झाड़ियां हटाकर देखा तो वहां लांचर पड़ा हुआ था।
गांव के सरपंच हरि दास ने तुरंत इसकी सूचना ममून पुलिस को दी। ममून पुलिस मौके पर पहुंची और कोई अनहोनी न हो इसके लिए रॉकेट बोरियों से कवर कर दिया। देर रात सेना को मामले की सूचना दी गई।
सूचना पर सेना की 68 इंजीनियरिंग रेजीमेंट के मेजर एसएम अली अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे और पड़ताल शुरू की। अंधेरा होने के कारण रॉकेट लांचर को निष्क्रिय नहीं किया जा सका।
रविवार सुबह सेना के बम निरोधक दस्ते ने रॉकेट को निष्क्रिय कर दिया। अब तक लांचर कहां से आया इसका पता नहीं चल पाया है।
कहा जा रहा है कि अक्सर कबाड़ी का काम करने वाले सेना की प्रैक्टिस ग्राउंड से इन्हें उठाकर ले आते हैं। संभावना है कि सक्रिय होने के कारण हादसे के डर से इसे यहां फेंक दिया गया होगा।
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ममून पुलिस थाना के एसएचओ गुरविंद्र सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। जांच के बाद ही पता चलेगा कि रॉकेट लांचर किसका है।
कई लोग गवां चुके हैं जान
पठानकोट। खुले में एक बार फिर बारूद मिलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं। बारूद सेना का है या कोई इसे यहां फेंककर चला गया, इसकी रिपोर्ट कभी नहीं आ पाई है।
पहले भी कई बार पठानकोट में कई जगहों पर खुले में बारूद मिल चुके हैं। इसके कारण कई लोग जान भी गंवा चुके हैं।
अकेले पठानकोट में ही दस साल में बारूद से पीतल निकालने की कोशिश में छह लोग जान गंवा चुके हैं। इनमें दो मासूम भी शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2010 में ममून गांव में कबाड़ की दुकान पर सेना के बम से पीतले निकालते समय दो लोगों की जान चली गई थी।
ममून छावनी के पास ही डेटोनेटर की छड़, सेल और रॉकेट लांचर मिला था। सुजानपुर में भी भारी तादाद में खाली कारतूस से भरे बैग मिले थे।
वर्ष 2008 में पठानकोट रेलवे स्टेशन परिसर में तोप का गोला भी मिल चुका है। पहले पठानकोट स्टेशन पर ही दो हैंड ग्रेनेड मिले थे, जिन्हें सेना ने मौके पर ही निष्क्रिय किया था। बताया जा रहा है कि अधिकतर विस्फोटक में पीतल का इस्तेमाल होता है।
कई बार सेना की ओर से युद्ध अभ्यास के दौरान विस्फोटक पदार्थ ऐसे ही छोड़ दिए जाते हैं जिन्हें लाकर पीतल निकालने के लिए कबाड़ियों को बेच दिया जाता है।
पांच साल पहले आनंदपुर रड़ा में कबाड़ के गोदाम में विस्फोटक से पीतल निकालते समय दो बच्चों समेत तीन लोगों की मौत हो गई थी। ममून छावनी के पास फिर से विस्फोटक मिलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।
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सेना की टीम ने सुरक्षा के बीच रॉकेट लांचर को कब्जे में लेकर उसे निष्क्रिय कर दिया। घटना से छावनी की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
फिलहाल पता नहीं चल पाया है कि रॉकेट लांचर सेना का है या बाहर से लाया गया है। सेना भी इस बारे में कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
जानकारी के अनुसार शनिवार देर शाम बुंगल निवासी अमीर चंद पुत्र खजाना चंद अपने मकान के पीछे पेड़ की टहनियां काट रहे थे।
इसी दौरान जमीन से झाड़ काटते समय उनकी कुल्हाड़ी किसी लोहे की चीज से टकराई। झाड़ियां हटाकर देखा तो वहां लांचर पड़ा हुआ था।
गांव के सरपंच हरि दास ने तुरंत इसकी सूचना ममून पुलिस को दी। ममून पुलिस मौके पर पहुंची और कोई अनहोनी न हो इसके लिए रॉकेट बोरियों से कवर कर दिया। देर रात सेना को मामले की सूचना दी गई।
सूचना पर सेना की 68 इंजीनियरिंग रेजीमेंट के मेजर एसएम अली अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे और पड़ताल शुरू की। अंधेरा होने के कारण रॉकेट लांचर को निष्क्रिय नहीं किया जा सका।
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रविवार सुबह सेना के बम निरोधक दस्ते ने रॉकेट को निष्क्रिय कर दिया। अब तक लांचर कहां से आया इसका पता नहीं चल पाया है।
कहा जा रहा है कि अक्सर कबाड़ी का काम करने वाले सेना की प्रैक्टिस ग्राउंड से इन्हें उठाकर ले आते हैं। संभावना है कि सक्रिय होने के कारण हादसे के डर से इसे यहां फेंक दिया गया होगा।
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ममून पुलिस थाना के एसएचओ गुरविंद्र सिंह ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। जांच के बाद ही पता चलेगा कि रॉकेट लांचर किसका है।
कई लोग गवां चुके हैं जान
पठानकोट। खुले में एक बार फिर बारूद मिलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं। बारूद सेना का है या कोई इसे यहां फेंककर चला गया, इसकी रिपोर्ट कभी नहीं आ पाई है।
पहले भी कई बार पठानकोट में कई जगहों पर खुले में बारूद मिल चुके हैं। इसके कारण कई लोग जान भी गंवा चुके हैं।
अकेले पठानकोट में ही दस साल में बारूद से पीतल निकालने की कोशिश में छह लोग जान गंवा चुके हैं। इनमें दो मासूम भी शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2010 में ममून गांव में कबाड़ की दुकान पर सेना के बम से पीतले निकालते समय दो लोगों की जान चली गई थी।
ममून छावनी के पास ही डेटोनेटर की छड़, सेल और रॉकेट लांचर मिला था। सुजानपुर में भी भारी तादाद में खाली कारतूस से भरे बैग मिले थे।
वर्ष 2008 में पठानकोट रेलवे स्टेशन परिसर में तोप का गोला भी मिल चुका है। पहले पठानकोट स्टेशन पर ही दो हैंड ग्रेनेड मिले थे, जिन्हें सेना ने मौके पर ही निष्क्रिय किया था। बताया जा रहा है कि अधिकतर विस्फोटक में पीतल का इस्तेमाल होता है।
कई बार सेना की ओर से युद्ध अभ्यास के दौरान विस्फोटक पदार्थ ऐसे ही छोड़ दिए जाते हैं जिन्हें लाकर पीतल निकालने के लिए कबाड़ियों को बेच दिया जाता है।
पांच साल पहले आनंदपुर रड़ा में कबाड़ के गोदाम में विस्फोटक से पीतल निकालते समय दो बच्चों समेत तीन लोगों की मौत हो गई थी। ममून छावनी के पास फिर से विस्फोटक मिलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।