Kabir Ke Dohe: संत कबीर दास हिंदी साहित्य के ऐसे कवि थे, जिन्होंने समाज में फैली भ्रांतियों और बुराइयों को दूर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। अपने दोहों के जरिए कबीर दास जी ने लोगों में भक्ति भाव का बीज बोया। कबीर दास न सिर्फ एक संत थे बल्कि वे एक विचारक और समाज सुधारक भी थे। कबीर दास जी के दोहे अत्यंत सरल भाषा में थे, जिसके कारण इनके दोहों ने लोगों पर व्यापक प्रभाव डाला। आज भी कबीर दास जी के दोहे जीवन जीने की सही राह दिखाते हैं। तो चलिए आज पढ़ते हैं संत कबीर के कुछ ऐसे ही अनमोल दोहे....
Kabir Ke Dohe: सफलता के करीब पहुंचा देते हैं कबीर के ये दोहे, जीवन को दिखाते हैं सही राह
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ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ- बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, लेकिन सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ- कोई व्यक्ति लंबे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।
अर्थ- शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है। यदि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियां सहज ही प्राप्त हो जाती हैं।
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही
अर्थ- जब मैं अपने अहंकार में डूबा था, तब प्रभु को न देख पाता था। लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अंधकार मिट गया। ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।