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जानिए क्यों विष्णुप्रिय तुलसी भगवान शिव और गणपति की पूजा में नहीं होती है शामिल

Fri, 08 Nov 2019 01:43 PM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: योगेश जोशी Updated Fri, 08 Nov 2019 01:43 PM IST
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tulsi is not used in shiv and ganesh puja
भगवान विष्णु को प्रिय है तुलसी

हिंदू धर्म की प्रत्येक पूजा में तुलसी का अपना अलग ही महत्त्व होता है। भगवान विष्णु की प्रिय होने की वजह से लक्ष्मी रुप माता तुलसी के बिना भगवान कोई प्रसाद तक ग्रहण नहीं करते हैं, पंरतु तुलसी भगवान शिव और गणपति की किसी भी पूजा में नहीं चढ़ाई जाती हैं। आखिर ऐसी क्या वजह है जिसकी वजह से माता तुलसी भगवान शिव और गणपति द्वारा पसंद नहीं की जाती हैं। आइए जानते हैं,

वृंदा कैसे बनी तुलसी

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पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था

पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था और वह जालंधर नाम के राक्षस की पत्नी थी। वह राक्षस वृंदा पर काफी जुल्म करता था। जालंधर को सबक सिखाने के लिए भगवान शिव ने विष्णु भगवान से आग्रह किया। तब विष्णुजी ने छल से वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग कर दिया। बाद में जब वृंदा को यह पता चला कि भगवान विष्णु ने उनका पतिव्रत धर्म भंग किया है तो उन्होंने विष्णुजी को श्राप दिया कि आप पत्थर के बन जाओगे। तब विष्णु जी ने तुलसी को बताया कि मैं तुम्हारा जालंधर से बचाव कर रहा था, अब मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम लकड़ी की बन जाओ। इस श्राप के बाद वृंदा कालांतर में तुलसी का पौधा बन गईं।

शिव की पूजा में क्यों नहीं चढ़ता तुलसी का पत्ता

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शिव जी की पूजा में बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं - फोटो : shiv temple

शिव जी की पूजा में तुलसी की जगह बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं क्योंकि तुलसी शापित है। दूसरा शिवजी की पूजा में तुलसी पत्र इसलिए भी नहीं चढ़ाया जाता है, क्योंकि वे भगवान श्रीहरि की पटरानी हैं और तुलसी जी ने अपनी तपस्या से भगवान श्रीहरि को पतिरूप में प्राप्त किया था।

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भगवान गणेश और माता तुलसी

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गणेश जी

एक बार गणेश जी गंगा किनारे तप कर रहे थे तो वहीं माता तुलसी अपने विवाह की इच्छा को पूर्ण करने के लिए तीर्थ यात्रा कर रही थीं। सभी तीर्थस्थलों का भ्रमण करते हुए वह एक दिन उसी गंगा के तट पर आ पहुंची जहां भगवान गणेश तप कर रहे थे। भगवान गणेश को तप करते देख वह उन पर मोहित हो गई और उन्होंने भगवान गणेश जी से विवाह का मन बना लिया। उन्होंने गणेश जी की तपस्या भंग कर उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। तपस्या भंग होने पर गुस्साए भगवान गणेश ने विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया और कहा कि वह ब्रह्माचारी हैं और इस बात से गुस्साई माता तुलसी ने भी गणेश जी को श्राप दिया और कहा कि उनके दो विवाह होंगे।

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भगवान गणेश को क्यों नहीं चढ़ाते हैं तुलसी

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गणेश जी ने तुलसी जी को श्राप दिया

इस पर गणेश जी ने भी उन्हें श्राप दिया और कहा कि उनका विवाह एक असुर शंखचूर्ण से होगा। राक्षस की पत्नी होने का श्राप सुनकर तुलसी जी ने गणेश जी से माफी मांगी तब भगवान गणेश ने उन्हें क्षमादान देते हुए कहा कि वह सतयुग में भगवान विष्णु और कृष्ण जी की प्रिय होने के साथ कलयुग में संसार को जीवन और मोक्ष देंगी लेकिन मेरी पूजा में तुलसी चढ़ाना अब अशुभ माना जाएगा उसी दिन से भगवान गणेश जी की पूजा में कभी भी तुलसी नहीं चढ़ाई जाती है।  

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