जानिए शरद पूर्णिमा का महत्व और पूजा विधि
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शरद पूर्णिमा का महत्व
शरद पूर्णिमा के दिन सुबह स्नान करने के बाद ही व्रत प्रारंभ हो जाता है। माताएं अपनी संतान की मंगल कामना के लिए इस दिन देवी-देवताओं का पूजन करती हैं। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के बेहद करीब आ जाता है और इस ऋतु में मौसम साफ रहता है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है।
इस दिन के धार्मिक कर्म इस प्रकार करने से विशेष फल मिलता है।
इस दिन सुबह नहाकर व्रत का संकल्प लें और मान्यता अनुसार इस दिन पवित्र नदी, जलाश्य या कुंड में स्नान करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत का लाभ अधिक मिलता है।
भगवान की प्रतिमाओं को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएं। भगवान को सजाने के बाद आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा आदि अर्पित कर पूजन करें।
गाय के दूध से बनी खीर में चीनी मिलाकर आधी रात के समय भगवान को भोग लगाएं। रात्रि में जब चंद्रमा आकाश के मध्य में स्थित हो तब चंद्र देव का विधि विधान से पूजन करें और खीर का नेवैद्य अर्पण करें।
इस दिन भगवान शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा होती है। भगवान को भोग लगाने के बाद रात को खीर से भरा बर्तन चांदनी रात में बाहर रख दें और दूसरे दिन उसे ग्रहण करें। इस दिन पूर्णिमा व्रत कथा सुननी चाहिए। कथा से पूर्व एक लोटे में जल और गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने में रोली व चावल रखकर कलश की वंदना करें और दक्षिणा चढ़ाएं। इस दिन भगवान शिव-पार्वती और भगवान कार्तिकेय की भी पूजा होती है।