Brahma Chalisa: भगवान श्री ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है। इस संसार के हर जीव का निर्माण ब्रह्मदेव ने ही किया है। त्रिदेवों में भी ब्रह्मा जी प्रथम हैं। ऐसे में ब्रह्मा जी की आराधना और स्तुति करना बेहद ही शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान भोलेनाथ और भगवान विष्णु की उपासना ब्रह्मा जी की पूजा के बिना अधूरी है। पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा चालीसा का पाठ करने से भगवान ब्रह्मा प्रसन्न होते हैं और जातक की सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। ऐसे में चलिए आज जानते हैं ब्रह्मा जी की उस चालीसा के बारे में जिससे भगवान ब्रह्मा प्रसन्न होंगे और आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी...
Brahma Chalisa: नियमित करें ब्रह्मा जी की चालीसा का पाठ, सभी मनोकामनाएं होंगी पूरी
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॥ चौपाई ॥
जय जय कमलासान जगमूला,
रहहू सदा जनपै अनुकूला ।
रुप चतुर्भुज परम सुहावन,
तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन ।
रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा,
मस्तक जटाजुट गंभीरा ।
ताके ऊपर मुकुट विराजै,
दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै ।
श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर,
है यज्ञोपवीत अति मनहर ।
कानन कुण्डल सुभग विराजहिं,
गल मोतिन की माला राजहिं ।
चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये,
दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये ।
ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा,
अखिल भुवन महँ यश विस्तारा ।
अर्द्धागिनि तव है सावित्री,
अपर नाम हिये गायत्री ।
सरस्वती तब सुता मनोहर,
वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर ।
कमलासन पर रहे विराजे,
तुम हरिभक्ति साज सब साजे ।
क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा,
नाभि कमल भो प्रगट अनूपा ।
तेहि पर तुम आसीन कृपाला,
सदा करहु सन्तन प्रतिपाला ।
एक बार की कथा प्रचारी,
तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी ।
कमलासन लखि कीन्ह बिचारा,
और न कोउ अहै संसारा ।
तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा,
अन्त विलोकन कर प्रण कीन्हा ।
कोटिक वर्ष गये यहि भांती,
भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती ।
पै तुम ताकर अन्त न पाये,
ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये ।
पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा
महापघ यह अति प्राचीन ।
याको जन्म भयो को कारन,
तबहीं मोहि करयो यह धारन ।
अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं,
सब कुछ अहै निहित मो माहीं ।
यह निश्चय करि गरब बढ़ायो,
निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये ।
गगन गिरा तब भई गंभीरा,
ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा ।
सकल सृष्टि कर स्वामी जोई,
ब्रह्म अनादि अलख है सोई ।
निज इच्छा इन सब निरमाये,
ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये ।
सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा,
सब जग इनकी करिहै सेवा ।
महापघ जो तुम्हरो आसन,
ता पै अहै विष्णु को शासन ।
विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई,
तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई ।
भैतहू जाई विष्णु हितमानी,
यह कहि बन्द भई नभवानी ।
ताहि श्रवण कहि अचरज माना,
पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना ।