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केदारनाथ के खुले कपाट, जानिए इस धाम की धार्मिक मान्यताएं और रहस्य
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 09 May 2019 04:05 PM IST
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केदारनाथ मंदिर
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9 मई 2019 से बाबा केदारनाथ मंदिर के कपाट खुल गए। करीब 6 महीने के लंबे इंतजार के बाद कपाट के खुलते ही देश -विदेश से आए सैकड़ों की संख्या में मौजूद भक्तों ने बाबा केदान नाथ के दर्शन किए। जब सर्दी पड़ने लगती है तो केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान ऐसी मान्यता है कि इस दौरान मंदिर में पूजा की जिम्मेदारी सभी देवताओं के कंधो पर आ जाती है। जब केदार नाथ मंदिर के कपाट बंद होते हैं तब उस समय एक अखंड ज्योति जलाकर रख दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि 6 महीने के बाद दोबारा मंदिर के दरवाजे खुलने पर अखंड ज्योति जलती रहती है। ऐसा कहा जाता है इस मंदिर की निर्माण आदि शंकराचार्य ने किया था। इसके अलावा केदारनाथ धाम के पीछ पांडवों की भी जिक्र आता है। आइए जानते हैं केदारनाथ के कुछ रहस्य
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केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग त्रिकोण आकार का है और इसकी स्थापना के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया।
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केदारनाथ मंदिर के बारे में मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव अपने भाईयों की हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे। जिसकी वजह से वह उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे।
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बाबा के दर्शन के लिए पांडव काशी पहुंच गए लेकिन वह उन्हें वहां भी नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे आए। भगवान शंकर अंर्तध्यान होकर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए।
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भगवान शंकर ने तब बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। तब भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर अपने फैल दिए। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंर्तध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल का पीठ का भाग पकड़ लिया।
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