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Guru Purnima 2021: क्या मनुष्य स्वयं ही अपना गुरु होता है, जानिए क्या कहता है गुरु के बारे में गीता का ज्ञान

Sat, 24 Jul 2021 10:13 PM IST
संकल्प सिंह राजीव नारायण दीक्षित
राजीव नारायण दीक्षित Published by: संकल्प सिंह Updated Sat, 24 Jul 2021 10:13 PM IST
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Guru Purnima 2021 Vyas Purnima Importance and its Significance
गुरु पूर्णिमा 2021 - फोटो : अमर उजाला

आज 24 जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। आषाढ़ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने पहली बार मानव जाति को 4 वेदों का ज्ञान दिया था। इस कारण उनको प्रथम गुरु की उपाधि भी दी जाती है। उनके द्वारा दी गई शिक्षाएं आज के समय में भी प्रासंगिक है। महाभारत की रचना भी उन्होंंने ही की थी। हमारी भारतीय संस्कृति में सदा से गुरुओं का काफी खास स्थान रहा है। ऐसे में आज के दिन स्नानादि नित्य-कर्म करके 'गुरुपरम्परासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये।' मंत्र से संकल्प करके, पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में मुख करके व्यास-पीठ की स्थापना करके, पंचोपचार आदि से ब्रह्म, ब्रह्मा, परापरशक्ति, व्यास, शुकदेव, गौड़पाद, गोविंदस्वामी, शंकराचार्य और समस्त ऋषियों का आवाहन करें और अपने दीक्षागुरु एवं माता-पिता, पितामह और अन्य वृद्धजनों का सम्मान करके आशीर्वाद प्राप्त करें।

Guru Purnima 2021 Vyas Purnima Importance and its Significance
गुरु पूर्णिमा 2021 - फोटो : अमर उजाला

क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?

भारतीय संस्कृति पुनर्जन्म एवं कर्म सिद्धांत पर आधारित है। मनुष्य अपने वर्तमान जीवन में जो भी अच्छा या बुरा कर्मफल प्राप्त करता है, शास्त्रों के अनुसार वह उसके प्रारब्ध कर्मों के कारण निश्चित होता है। 84 लाख विभिन्न जन्मों में किये कर्मों अथवा संस्कारों के पुण्य कर्मों से प्रारब्ध बनता है। वेदानुसार, वर्तमान जीवन में मनुष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि चारों पुरुषार्थों के द्वारा आगामी कर्मों को करते हुए, सुख, शांति, स्वास्थ्य प्राप्त करके अपने जीवन को सफल और उन्नत बना सकता है।

Guru Purnima 2021 Vyas Purnima Importance and its Significance
गुरु पूर्णिमा 2021 - फोटो : Social media

गुरु कौन होता है?

किसी विषय में हमें जिससे ज्ञानरूपी प्रकाश मिले, हमारा अज्ञान का अंधकार दूर हो, उस विषय में वह हमारा गुरू है। इसी तरह, जो ज्ञानी या सतपुरूष हमें धर्मशास्त्रों के ज्ञान से और परमात्मा के सम्मुख यानि संबंध जोड़ता है, वही सच्चा गुरु हो सकता है। गुरु का काम मनुष्य को अपने साथ नहीं, परमात्मा के साथ संबंध जोड़ने का होता है। भगवान के साथ तो हमारा संबंध सदा से और स्वाभाविक है, क्योंकि हम भगवान के सनातन अंश हैं। गीता अध्याय 15, श्लोक 7 में भगवान स्वयं कहते हैं, हे अर्जुन 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन:।' अर्थात इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है। जीवन का परम सत्य तो ये ही है, भेजा भी उसने है और जाना भी उसी के पास है। गुरु केवल उस भूले हुये संबंध की सिर्फ याद कराता है, कोई नया संबंध नहीं जोड़ता।

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गुरु पूर्णिमा 2021 - फोटो : Social media

गीता के अनुसार गुरु की व्याख्या 

'गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते। 
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः।।'

गीता के अनुसार 'गु' नाम अंधकार का है और 'रु' नाम प्रकाश का है, अतः जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करदे वही ही गुरु है। जिसके मन में धन की इच्छा होती है, वह धनदास होता है और ऐसे ही जिसके मन में चेले बनाने की इच्छा होती है, वह चेलादास होता है। 'सिद्ध पुरुष प्रसिद्धि नहीं चाहता और प्रसिद्ध पुरुष सिद्ध नहीं हो सकता।' जो सच्चे संत-महात्मा होते हैं, उनको गुरु बनने का शौक नहीं होता, अपितु समस्त मानवता और संसार के कल्याण की लगन होती है।

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गुरु पूर्णिमा 2021 - फोटो : Social media

क्या मनुष्य अपना स्वयं ही गुरु है?

यह सिद्धांत है, कि जो दूसरे को कमजोर बनाते हैं, वह खुद ही कमजोर होते हैं। जो दूसरे को समर्थ बनाते हैं, वह खुद समर्थ होते हैं। भगवान सबसे बड़े हैं, इसलिए वे किसी को छोटा नहीं बनाते। जो भगवान के चरणों की शरण हो जाता है, वह संसार में बड़ा हो जाता है। भगवान सबको अपना मित्र या सखा बनाते हैं, अपने समान बनाते हैं, किसी को अपना चेला नहीं बनाते। जैसे, निषादराज, विभीषण, सुग्रीव, हनुमानजी, अर्जुन इत्यादि। श्रीमद्भागवत में कहा गया है 'आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः' अर्थात् मनुष्य आप ही अपना गुरू है। हमारा विवेक ही हमारा गुरु है, भक्ति, ध्यान से हमारा विवेक जागृत होता, जो निरंतर बढ़ते-बढ़ते तत्त्वज्ञान में परिवर्तित हो जाता है।
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