महाभारत में भीष्म पितामाह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इस कारण तीरों की शैय्या पर होने के बावजूद भीष्म कई दिनों तक जीवित रहे। उन्होंने दुर्योधन को समझाने की कोशिश की लेकिन दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी। पितामह के मृत्यु की शैय्या पर लेटे होने बाद भी आठ दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा।
युद्ध के बाद युधिष्ठिर की ग्लानि और पश्चाताप को दूर करने के लिए भीष्म ने राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म के बहुमूल्य उपदेश दिए। ये उपदेश हमारे जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनके उपदेशों में से कुछ अंश आप आगे पढ़ सकते हैं।
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अपने मन को सदैव वश में रखना चाहिए
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अपने मन को सदैव वश में रखना चाहिए। कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। अगर कोई आपको कटु वचन कहता है तो भी उसे कुछ नहीं कहना चाहिए। अतिथि और लाचार को सदैव आश्रय दें। दूसरों की न निंदा करें और न सुनें।
मार खाने पर भी अपने आप को शांत रखें। शास्त्रों को सदैव नियम पूर्वक सुने और पढ़े। दिन के समय न सोना। क्रोध न करना। स्वंय आदर की इच्छा न करके भी दूसरों का सम्मान करना। भोजन स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ के लिए करना। आगे पढ़े....
सत्य ही सनातन धर्म है। यह सभी धर्मों से उत्तम है। सत्य से ही तप और योग उत्पन्न होते हैं। सत्य ही ब्रह्मा है। सब कुछ सत्य के अंतर्गत आता है। सत्य से ही मनुष्य स्वर्ग जाता है। झूठ हमें अंधकार की तरफ ले जाता है। यहां पर प्रकाश का अर्थ स्वर्ग तो नरक को अंधकार कहा गया है।
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वेद भी सत्य का ही उपदेश देते हैं
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सभी प्रणियों को एक समान समझना, ईर्ष्या द्बेश से दूर रहना, शील और लज्जा के गुणों को अपनाना, दुष्कर्मों से दूर रहना, किसी को कष्ट न पहुंचाना, इनद्रियों को वश में रखना, मन की पवित्रता को बनाए रखना, सत्य बोलना, क्षमा करना, साहस और विद्या आदि ये तेरह सत्य धर्म के लक्षण हैं। वेद भी सत्य का ही उपदेश देते हैं। सत्य बोलना सहस्त्रों अश्वमेध यज्ञों के फल के बराबर होता है।
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कभी भी कटु वचन न बोलें सदैव ऐसे वचन बोलो जो दूसरे को अच्छे लगें
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कभी भी कटु वचन न बोलें सदैव ऐसे वचन बोलो जो दूसरे को अच्छे लगें। बुरा बोलना,निंदा करना, भला बुरा कहना यह सब त्याग देना चाहिए। दूसरों के सम्मान न करना, अहंकार दिखाना ये सभी अवगुण होते हैं।