शारदीय नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की उपासना की जाती है। इस बार शारदीय नवरात्रि आठ दिनों की है। हिंदू मान्यताओं में मां कूष्मांडा को सृष्टि की रचनाकार और अपनी दिव्य ऊर्जा से संसार को प्रकाश देने वाली देवी माना जाता है। भक्त उनकी पूजा करके सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की कामना करते हैं। धार्मिक विश्वास है कि मां की आराधना से मनोबल बढ़ता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। आइए जानते हैं नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा विधि, मंत्र, आरती, व्रत कथा और प्रिय भोग से जुड़ी सभी जरूरी बातें।
नवरात्रि का चौथा दिन: जानें मां कूष्मांडा की पूजा विधि, मंत्र, आरती, कथा और भोग की पूरी जानकारी
नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की उपासना की जाती है। आइए जानते हैं नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा विधि, मंत्र, आरती, व्रत कथा और प्रिय भोग से जुड़ी सभी जरूरी बातें।
मां कूष्मांडा का स्वरूप और महत्व
मां कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनकी आठ भुजाओं में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला विराजमान हैं। उनका वाहन सिंह है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी का तेज सूर्य के समान प्रकाशमान है और उनका निवास सूर्य मंडल में माना जाता है। उनकी उपासना को साहस, आरोग्य, यश और समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है।
मां कूष्मांडा की पूजा विधि
- नवरात्रि के चौथे दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल की सफाई करके मां कूष्मांडा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- दीपक जलाकर देवी का ध्यान करें और उन्हें जल, पुष्प, अक्षत, रोली तथा माला अर्पित करें।
- इसके बाद धूप-दीप दिखाएं और फल-मिठाई का भोग लगाएं।
- पूजा के अंत में मां की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।
मां कूष्मांडा को कौन-सा भोग लगाएं?
मां कूष्मांडा को कुम्हड़ा यानी पेठा अर्पित करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा केसरिया हलवा, पीले रंग की मिठाइयां, मालपुआ, बताशे, फल और नारियल भी चढ़ाए जा सकते हैं। कुछ परंपराओं में दही और विभिन्न प्रकार के हलवे का भोग लगाने की मान्यता है। व्रत रखने वाले भक्त सिंघाड़े के आटे का हलवा बनाकर भी अर्पित कर सकते हैं।
मां कूष्मांडा व्रत कथा
नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के कूष्मांडा स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार फैला हुआ था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। उनके दिव्य तेज से सृष्टि में प्रकाश का संचार हुआ। इसी कारण उन्हें आदिशक्ति और सृष्टि की रचनाकार माना जाता है।
मां कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है, क्योंकि उनकी आठ भुजाएं हैं। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला सुशोभित होते हैं। जपमाला को सिद्धि और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। देवी का वाहन सिंह है, जो साहस और पराक्रम दर्शाता है। कुम्हड़ा यानी कद्दू मां को प्रिय माना जाता है, इसलिए उनका नाम कूष्मांडा पड़ा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा का निवास सूर्य मंडल में है और उनका तेज सूर्य के समान प्रकाशमान है। श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करने से रोग, शोक और कष्ट दूर होने की मान्यता है। भक्त मां से अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु, यश, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। नवरात्रि के चौथे दिन देवी की आराधना विशेष फलदायी मानी जाती है।