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Holi 2021: बरसाना की लट्ठमार होली है विश्व प्रसिद्ध, जानिए कैसे और क्यों खेली जाती है ऐसी होली

Thu, 18 Mar 2021 07:46 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Thu, 18 Mar 2021 07:46 AM IST
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Holi 2021 barsana lathmar holi 2021 Date and significance
होली 2021 - फोटो : अमर उजाला

Holi 2021: होली उत्सव 29 मार्च को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका दहन करने के बाद अगले दिन होली उत्सव मनाया जाता है। रंगों का यह त्योहार अपने आप में निराला है। इस पर्व में प्रेम, यौवन, सांस्कृतिक संगीत और नृत्य, रंग, समरसता, मिठास इन सभी चीजों का समावेश है। होली को बरसाने की होली और भी खास बनाती है। ये होली रंग-गुलाल के साथ-साथ लाठी और डंडों से खेली जाती है। 

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बरसाने की लट्ठमार होली 2021 - फोटो : अमर उजाला
बरसाने की लट्ठमार होली

बरसाने की लट्ठमार होली देश और दुनिया में भी काफी प्रसिद्ध है। इस साल यह होली 23 मार्च को बरसाने में खेली जाएगी। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को बरसाने में लट्ठमार होली मनाई जाती है। नवमी के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां लोग रंगों, फूलों के अलावा डंडों से होली खेलते हैं।

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बरसाना में हुरियारों पर प्रेमपगी लाठियां बरसातीं हुरियारिनें - फोटो : अमर उजाला
धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता है कि बरसाना में राधा जी का जन्म हुआ था। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को नंदगांव के लोग होली खेलने के लिए बरसाना गांव जाते हैं। जहां पर लड़कियों और महिलाओं के संग लट्ठमार होली खेली जाती है। इसके बाद फाल्गुन शुक्ल की दशमी तिथि पर रंगों की होली खेली होती है।

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बरसाना की लठामार होली - फोटो : Amar Ujala
भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है परंपरा

लट्ठमार होली खेलने की परंपरा भगवान कृष्ण के समय से चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण अपने दोस्तों संग नंदगांव से बरसाना जाते हैं। बरसाना पहुंचकर वे राधा और उनकी सखियों संग होली खेलते हैं। इस दौरान कृष्णजी राधा संग ठिठोली करते हैं जिसके बाद वहां की सारी गोपियां उन पर डंडे बरसाती हैं।

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लाठी डंडों से खेली जाती है बरसाने की होली - फोटो : Amar Ujala
लाठी डंडों से खेली जाती है होली

गोपियों के डंडे की मार से बचने के लिए नंदगांव के ग्वाले लाठी और ढ़ालों का सहारा लेते हैं। यही परंपरा धीरे-धीरे चली आ रही है जिसका आजतक पालन किया जा रहा है। पुरुषों को हुरियारे और महिलाओं को हुरियारन कहा जाता है। इसके बाद सभी मिलकर रंगों से होली का उत्सव मनाते है।

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