आज हम शक्ति विशेष में एक ऐसी महिला के बारे में बताने जा रहे हैं जिसने समाज की रूढ़ियों को तोड़ा और उस मुकाम को हासिल किया कि आज दुनिया उस पर गर्व महसूस करती है। इस महिला ने परिवार की बंदिशों को तोड़कर दुनिया में अपना नाम कमाया है। 2017 में इन्हें संगीत के क्षेत्र में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। तो चलिए जानें उस अद्भुत महिला के बारे में....
हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड निवासी 66 साल की बसंती बिष्ट की। बसंती बिष्ट का जन्म उत्तराखंड के एक सीमांत गांव ल्वाणी में हुआ। यह गांव नंदा देवी राजजात यात्रा के मार्ग पर स्थित है। नंदा देवी को क्षेत्र के लोग अपनी बेटी की तरह पूजते हैं। इसलिए यहां वर्षों से नंदा देवी के जागर गायन की परंपरा विद्यमान है।
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Basanti Bisht
- फोटो : AmarUjala
जागर गायन को मूलत: पुरुषों का कार्य माना जाता था। गांव और पहाड़ में महिलाओं के मंच पर जागर गाने की परंपरा नहीं थी। इसलिए बचपन में जब बसंती ने जागर गाने की अपनी इच्छा जाहिर की तो उनके खुद के परिवार ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी।
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Basanti Bisht
- फोटो : AmarUjala
बसंती को बचपन से संगीत में रूचि थी लेकिन सामाजिक बेड़ियों के चलते के चलते उनकी यह हसरत पूरी नहीं हो सकी। लेकिन उन्होंने अपनी ये हसरत शादी के बाद पूरी की। उनके पति रणजीत सिंह ने उन्हें प्रोत्साहित किया। पति ने उन्हें गुनगुनाते हुए सुना तो विधिवत रूप से सीखने की सलाह दी। पहले तो बसंती तैयार नहीं हुई लेकिन पति के जोर देने पर उन्होंने सीखने का फैसला किया। हारमोनियम संभाला और विधिवत रूप से सीखने लगी।
उत्तराखण्ड आन्दोलन के समय मुजफ्फरनगर, खटीमा और मसूरी गोलीकांड की पीड़ा को बसंती बिष्ट ने गीत में पिरोया और राज्य आंदोलन में कूद पड़ी। अपने लिखे गीतों के जरिये वह लोगों से राज्य आंदोलन को सशक्त करने का आह्वान करती। राज्य आंदोलन के तमाम मंचों पर वह लोगों के साथ गीत गाती। इससे उन्हें मंच पर खड़े होने का हौसला मिला।
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