देखिए एस्ट्रोसेट लांच होते ही कैसे भारतीय वैज्ञानिकों ने रचा इतिहास
श्रीहरिकोटा में देश का पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल (पीएसएलवी) लगातार 31वीं बार सफल रहा और इसी के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास अंतरिक्ष में अपनी शोध वेधशाला है। रॉकेट ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरने के करीब 25 मिनट बाद एस्ट्रोसेट को परिभ्रमण कक्ष में सफलता पूर्वक छोड़ दिया। एस्ट्रोसेट के साथ छह विदेशी उपग्रह भी भेजे गए हैं। इनमें से चार अमेरिका के हैं।
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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार पीएसएलवी-सी30 ने पहले एस्ट्रोसेट को धरती से करीब 650 किलोमीटर ऊपर कक्षा में छोड़ा। इसके बाद करीब तीन मिनट में बाकी छह उपग्रह छोड़े गए। इसरो के चेयरमैन एएस किरण कुमार ने अभियान की सफलता के तुरंत बाद मिशन कंट्रोल सेंटर में अपने साथियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस अभियान पर देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर की निगाहें टिकी थीं। इससे वैज्ञानिक समुदाय को नई जानकारी हासिल होगी। इसरो ने अपनी ख्याति के अनुरूप इस अभियान को बेहद कम बजट करीब 178 करोड़ रुपये में अंजाम दिया है।
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संगठन की एक और बड़ी उपलब्धि अमेरिकी उपग्रहों का प्रक्षेपण है। सैन फ्रांसिस्को की कंपनी ने इसरो की कॉमर्शियल शाखा अंतरिक्ष कारपोरेशन लिमिटेड के साथ करार किया था। यह पहली बार है जब अमेरिका ने अपने उपग्रह इसरो के माध्यम से भेजे हैं। इसके अलावा एक-एक उपग्रह इंडोनेशिया और कनाडा का है। प्रधानमंत्री ने दी बधाई- देश का मान बढ़ाने वाले इसरो के वैज्ञानिकों को चारों तरफ से बधाई मिल रही है। अमेरिका में मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया है कि यह भारतीय विज्ञान तथा वैज्ञानिकों की एक और बड़ी उपलब्धि है।
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भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में घरेलू उद्योग से और अधिक सक्रिय भागीदारी का आह्वान करते हुए इसरो ने सोमवार को कहा कि उसे अगले तीन-चार साल में निजी उद्योगों द्वारा तैयार एवं असेंबल किए गए प्रक्षेपण यानों के सामने आने की उम्मीद है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा कि करीब तीन से चार साल में इसरो का लक्ष्य उद्योग द्वारा तैयार व असेंबल किए गए पीएसएलवी का प्रक्षेपण देखना है। देश के प्रथम वेधशाला उपग्रह एस्ट्रोसैट के सफल प्रक्षेपण के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल (पीएसएलवी) प्रोग्राम में करीब 150 कंपनियों की भागीदारी का संकेत दिया।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सार्क के सदस्य देशों के लिए प्रस्तावित सार्क सैटेलाइट के बारे में कुमार ने कहा कि श्रीलंका ने आवृत्ति के लिए अपनी सहमति दे दी है जबकि इसरो को अन्य देशों के जवाब का इंतजार है। 2016 के अंत तक सैटेलाइट लांच करने की योजना है जिसमें एक्सक्लूसिव और साझा दोनों तरह के ट्रांसपोन्डर्स होंगे जिन्हें सार्क के सदस्य देशों को आवंटित किया जाना है। कुमार ने कहा कि आने वाले महीनों में इसरो की परियोजना में सिंगापुर के छह सैटेलाइट की कॉमर्शियल लांचिंग, कुछ नैविगेशनल सैटेलाइट और जीसैट-15 शामिल हैं।