7 मुद्दे, जिन्होंने बदल दिया बिहार चुनाव का रुख
अन्य चुनावों की तरह ही बिहार विधानसभा चुनावों को भी तमाम राजनीतिक दलों ने विकास के मुद्दे पर लड़ने का वादा किया था, लेकिन जैसे-जैसे चुनावी पारा ऊपर आया विकास का मुद्दा काफूर हो गया। तकरीबन डेढ़ महीने चली चुनावी जद्दोजहद किन मुद्दों पर हुई, किन मुद्दों ने तय किया मतदाताओं की रुख, पढ़िए इस पड़ताल में।
7 मुद्दे, जिन्होंने बदल दिया बिहार चुनाव का रुख
'जीतनराम मांझी पर जुल्म हुआ, तो मैं बेचैन हो गया। मुझे लगा, अरे मोदी का क्या क्लास है, उसकी तो थाली खींच ली। एक चाय वाले के बेटे की थाली खींच लें, गरीब के बेटे की थाली खींच लें, लेकिन एक महादलित की तो सारी की सारी पूंजी, सारा-सारा पुन्य खींच कर ले लिया। तब मुझे लगा शायद डीएनए में ही गड़बड़ है।' 25 जुलाई को बीजेपी की मुजफ्फरपुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महागठबंधन के दोनों दलों जदयू और राजद पर कई आरोप लगाए थे। हालांकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के खिलाफ दिया ये बयान एक ऐसा तीर साबित हुआ, जिसे जदयू के रणनीतिकारों पलट कर मोदी पर ही चला दिया। नीतीश कुमार ने मोदी के बयान को बिहारियों के अस्मिता से जोड़ दिया। बयान के विरोध में जदयू ने 'शब्दवापसी अभियान' चलाया। बिहार के 50 लाख निवासियों का डीएनए और हस्ताक्षर प्रधानमंत्री कार्यालय भेजने का दावा किया गया। प्रधानमंत्री ने अपने शब्द वापस नहीं लिए, लेकिन नीतीश ने बिहार गौरव और अस्मिता से जोड़ कर चुनावों को रुख तय करने प्रयास जरूर किया।
7 मुद्दे, जिन्होंने बदल दिया बिहार चुनाव का रुख
बिहार विधानसभा चुनावों के दरम्यान ही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की मांग कर दी। गुजरात में पटेल समुदाय द्वारा मांगे जा रहे आरक्षण के मुद्दे पर बोलते हुए सितंबर के आखिरी हफ्ते में दिए एक बयान में उन्होंने कहा, 'हमारा मनाना है, ऐसे लोगों की एक कमेटी बनाई जाए, जो वास्तव में पूरे देश के हितों की चिंता करते हों और सामाजिक एकता के लिए प्रतिबद्घ हों। उन्हें निर्णय करना चाहिए कि किसी वर्ग को आरक्षण की आवश्यकता है और कब तक है?' संघ प्रमुख का ये सुझाव चुनावों में भाजपा के गले की हड्डी बन गया। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने इसे मुद्दा बना लिया और मोदी सरकार को चुनौती दे डाली की, वे आरक्षण खत्म करके दिखाए। उन्होंने चुनावों को 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' की लड़ाई करार दिया। हालात ये बने की लालू के वार भोथरा करने के लिए मोदी को आरक्षण के भीतर के 'धार्मिक विभाजन' को उभारना पड़ा। हालांकि प्रधानमंत्री के बयानों को 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' का प्रयास मानकर उसकी आलोचना भी हुई।
7 मुद्दे, जिन्होंने बदल दिया बिहार चुनाव का रुख
28 सितंबर की रात बिहार से सैकड़ों किलोमीटर दूर मुल्क की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसे एक गांव बिसाड़ा में गोमांस खाने के शक में 52 वर्षीय मुसलमान अखलाक को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। उस हत्या की गूंज दुनिया भर में सुनाई दी, बिहार भी उससे अछूता न रहा। सवाल गोमांस खाने का उठा और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कहा कि हिंदू भी बीफ खाते हैं और इसके जरिए देश का सांप्रदायीकरण किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ''अपने को हिंदू कहने वाला भी बीफ खा रहा है, जो मांस खाता है उसको गाय और बकरा से क्या फर्क है? ये सांप्रदायीकरण हो रहा है।'' लालू के बयान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनके शरीर में शैतान घुस गया है। बीजेपी ने लालू के 'अगड़ा बनाम पिछड़ा' बरअक्स बीफ को मुद्दा बनाने की पुरजोर कोशिश की।
7 मुद्दे, जिन्होंने बदल दिया बिहार चुनाव का रुख
बिहार विधानसभा चुनावों में दाल भाजपा की दुखती रग साबित हुई। चुनावी रैलियों में आरक्षण के बाद विकास प्रधानमंत्री मोदी का पसंदीदा विषय रहा, हालांकि लोकसभा चुनावों के इतर उन्होंने महंगाई पर घनी चुप्पी ओढ़े रखी। बिहार विधानसभा चुनावों के दरम्यान देश के कई हिस्सों में दाल 200 रुपए किग्रा तक बिकी, जबकि तीन से चार महीने पहले तक ये 110 से 120 रुपए किग्रा तक थी। सरकार ने अपनी सफाई में दाल की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए राज्य सरकारों की जिम्मेदार ठहराया। चुनावों में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने दाल की कीमतों का सवाल बार-बार उठाया।