अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
शोले के रामगढ़ को लेकर आपने कई कहानियां सुनी होंगी। सुना होगा कि निर्माता जीपी सिप्पी और उनके निर्देशक बेटे रमेश सिप्पी ने फिल्म की शूटिंग के लिए एक गांव बसा दिया था। समय के साथ वह बदल गया होगा पर अब भी है। लेकिन इन कहानियों में कोई सच्चाई नहीं है। सच्चाई जानना चाहेंगे? (रिपोर्ट व तस्वीरेंः जनार्दन पांडेय, रामगढ़ से लौटकर)
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
असल में फिल्म निर्माता जीपी सिप्पी यानि गोपालदास परमानंद सिप्पी बॉक्स ऑफिस पर मेरे सनम (1965), ब्रह्मचारी (1968), अंदाज (1971) व सीता और गीता (1972) की जबर्दस्त सफलता के बाद कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने बेटे को पैसे की चिंता किए बगैर एक बड़ी फिल्म बनाने को कहा।
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
पैसे की इस बेफिक्री का नतीजा शोले है। स्क्रिप्ट राइटरों को कई गुना अधिक पैसे देकर पटकथा लिखवाई गई। जब बात लोकेशन की आई तो उन्होंने तय किया कि ये फिल्म डाकुओं पर आधारित बाकी फिल्मों की तरह चम्बल की घाटी या राजस्थान में नहीं शूट की जाएगी। इसके लिए कोई नई जगह ढूंढ़ी जाए, चाहे जो खर्चा आए।
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
मंगलौर-बंगलौर और कोचीन में सफर करते फिल्म के कला निर्देशक राम येडेकर को बंगलौर के पास की एक जगह दिखी, जो चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी थी। खबर मिलते ही सिप्पी सिनेमाटोग्राफर द्वारका दिवेचा को लेकर हवाई जहाज से वहां पहुंच गए। बड़ी-बड़ी इमारतों के आकार की की चट्टानें, बीहड़...
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
बड़ी-बड़ी इमारतों के आकार की की चट्टानें, बीहड़। सूखे पेड़। उबड़-खाबड़ रास्ते। और क्या चाहिए था सिप्पी को। मनपसंद लोकेशन सामने मौजूद थी। जगह का नाम था- रामनगरम्। तब वह एक तालुका (छोटा कस्बा) थी। न कोई रोक, न टोक। मुंबई से सैकड़ों की पलटन लेकर सिप्पी वहां जा धमके।