{"_id":"e251ae75fb58bc1414ade022a28c98d3","slug":"sholay-s-ramgarah-after-40-years","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे ","category":{"title":"Entertainment Archives","title_hn":"एंटरटेनमेंट आर्काइव","slug":"entertainment-archives"}}
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
Wed, 26 Aug 2015 12:30 PM IST
Updated Wed, 26 Aug 2015 12:30 PM IST
विज्ञापन
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
1 of 11
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
Link Copied
शोले के रामगढ़ को लेकर आपने कई कहानियां सुनी होंगी। सुना होगा कि निर्माता जीपी सिप्पी और उनके निर्देशक बेटे रमेश सिप्पी ने फिल्म की शूटिंग के लिए एक गांव बसा दिया था। समय के साथ वह बदल गया होगा पर अब भी है। लेकिन इन कहानियों में कोई सच्चाई नहीं है। सच्चाई जानना चाहेंगे? (रिपोर्ट व तस्वीरेंः जनार्दन पांडेय, रामगढ़ से लौटकर)
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
2 of 11
असल में फिल्म निर्माता जीपी सिप्पी यानि गोपालदास परमानंद सिप्पी बॉक्स ऑफिस पर मेरे सनम (1965), ब्रह्मचारी (1968), अंदाज (1971) व सीता और गीता (1972) की जबर्दस्त सफलता के बाद कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपने बेटे को पैसे की चिंता किए बगैर एक बड़ी फिल्म बनाने को कहा।
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
3 of 11
पैसे की इस बेफिक्री का नतीजा शोले है। स्क्रिप्ट राइटरों को कई गुना अधिक पैसे देकर पटकथा लिखवाई गई। जब बात लोकेशन की आई तो उन्होंने तय किया कि ये फिल्म डाकुओं पर आधारित बाकी फिल्मों की तरह चम्बल की घाटी या राजस्थान में नहीं शूट की जाएगी। इसके लिए कोई नई जगह ढूंढ़ी जाए, चाहे जो खर्चा आए।
विज्ञापन
विज्ञापन
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
4 of 11
मंगलौर-बंगलौर और कोचीन में सफर करते फिल्म के कला निर्देशक राम येडेकर को बंगलौर के पास की एक जगह दिखी, जो चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी थी। खबर मिलते ही सिप्पी सिनेमाटोग्राफर द्वारका दिवेचा को लेकर हवाई जहाज से वहां पहुंच गए। बड़ी-बड़ी इमारतों के आकार की की चट्टानें, बीहड़...
विज्ञापन
अब शोले का 'रामगढ़' देखने जाएंगे तो रोते हुए लौटेंगे
5 of 11
बड़ी-बड़ी इमारतों के आकार की की चट्टानें, बीहड़। सूखे पेड़। उबड़-खाबड़ रास्ते। और क्या चाहिए था सिप्पी को। मनपसंद लोकेशन सामने मौजूद थी। जगह का नाम था- रामनगरम्। तब वह एक तालुका (छोटा कस्बा) थी। न कोई रोक, न टोक। मुंबई से सैकड़ों की पलटन लेकर सिप्पी वहां जा धमके।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।