सोशल मीडिया पर ब्वॉयज लॉकर रूम नाम से एक हैशटैग #boyslockerroom ट्रेंड हो रहा है। ट्विटर पर लगभग 30 हजार ट्वीट किए जा चुके हैं। इंस्टाग्राम पर भी इसको लेकर हजारों पोस्ट लिखे जा रहे हैं। इंस्टा पर इस ग्रुप में करीब 16-17 साल के कई सारे लड़के शामिल हैं, जो आपस में लड़कियों और महिलाओं की गंदी तस्वीरें पोस्ट करते हैं और उनका सामूहिक दुष्कर्म करने तक की बात करते हैं।
तीन मई को एक इंस्टा यूजर इस ग्रुप की चैट सार्वजनिक करती है और फिर दिल्ली महिला आयोग की ओर से इस पर कार्रवाई करते हुए नोटिस भेजा जाता है। फिलहाल दिल्ली पुलिस की साइबर सेल इस मामले की जांच कर रही है। एक किशोर की गिरफ्तारी भी हो चुकी है। लेकिन एक सवाल जो पूरे समाज में कौंध रहा है कि किशोरों के दिमाग में चल रही ऐसी घिनौनी बातें आखिर आती कहां से है! क्या सोशल मीडिया की चकाचौंध के बीच भविष्य की पीढ़ी का नैतिक पतन हो रहा है?
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वेब सीरीज
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बच्चों में इस तरह के नैतिक पतन को लेकर कई कारण हो सकते हैं। इसके लिए शुरू से ही इंटरनेट, सोशल मीडिया, अश्लील फिल्मों को दोष दिया जाता रहा है। फिल्मों के नियमन और सर्टिफिकेशन के लिए तो सेंसर बोर्ड है, लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर ज्यादा स्वतंत्रता या कहा जाए ज्यादा खुलापन है। वेब सीरीज में अश्लील कंटेंट पर फिलहाल बहुत नियंत्रण नहीं है। लेकिन बच्चों की विकृत होती मानसिकता के पीछे और कौन से कारण हो सकते हैं?
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि आधुनिक समय में हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर बढ़ चले हैं और सीमित हो गए हैं। संयुक्त परिवार में बच्चों को मिलने वाली सामाजिकता और संस्कार एकल परिवार में नहीं मिल पाता। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास इतना समय नहीं कि बच्चों पर ध्यान दे पाएं। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, अभिवावकों को बच्चों के लिए समय निकालना चाहिए। उनकी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।
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Moral Education
- फोटो : scoopwhoop
हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से बाल मनोविज्ञान पर शोध कर रहीं आएशा कहती हैं कि शिक्षा नीति में बदलाव भी इसका एक कारण हो सकता है। अपने शोध को लेकर विशेषज्ञों का साक्षात्कार लेने के क्रम में एक अहम बिंदु यह सामने आया कि पहले जहां नैतिक शिक्षा हमारे पाठ्यक्रम में शामिल रहता था, वह गायब सा हो गया है। नैतिक शिक्षा को बच्चों के पाठ्यक्रम में फिर से शामिल किया जाना चाहिए।
बच्चों के भटकाव में इंटरनेट और सोशल मीडिया का भी बड़ी भूमिका है। इसने लोगों के जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया है, जिससे सामाजिक मूल्यों में भी गिरावट आ रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि आजकल बच्चे अपनों से दूर होते जा रहे हैं और पराए लोगों के नजदीक होते जा रहे हैं। जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं भी जानते, उनसे बात करने में मस्त हैं। माता-पिता के साथ बच्चों का संवाद कम हो रहा है। इसे दूर किया जाना चाहिए।