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मार्केट में आ गई है कॉकरोच से बनी ब्रेड, खाने वाले हो जाएं सावधान
बीबीसी
Updated Mon, 08 Oct 2018 05:38 PM IST
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Cockroach bread
अगर आप थोड़ी देर रुक कर ऊपर की तस्वीर को देखेंगे तो शायद आपको लगेगा, ये कोई आम ब्रेड ही है लेकिन ये साधारण ब्रेड नहीं है बल्कि कॉकरोच से बनी ब्रेड है। सही शब्दों में कहें तो ब्रेड बनाने के लिए जिस आटे का इस्तेमाल हुआ है उसमें सूखे कॉक्रोचों से बना आटा मिलाया गया है। लेकिन आखिर रसोई और स्टोरहाउस में दिखाई देने वाले इस कीड़े से आटा बनाने और फिर उससे ब्रेड बनाने का ख्याल किसे और क्यों आया होगा? इसे तैयार किया है ब्राजीली शोधकर्ताओं की एक टीम ने जो दुनिया में खाने की कमी की समस्या के साथ-साथ भविष्य के लिए एनिमल प्रोटीन से भरे पौष्टिक खाने की तलाश कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार साल 2050 तक दुनिया की जनसंख्या 9.7 अरब हो जाएगी।
Cockroach bread
शोधकर्ताओं का कहना है कि यही कारण है कि अब खाने में कीड़ों को भी शामिल करने का वक़्त आ गया है। वो कहते हैं कीड़े आसानी से मिलते हैं, प्रोटीन से भरे होते हैं और इनकी कीमत भी कम होती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में ये भोजन का अहम हिस्सा बन चुके हैं
लेकिन तस्वीर में जो ब्रेड है वो आपके-हमारे किचन में दिखने वाले आम कॉकरोच से नहीं बना है बल्कि एक कॉकरोच की एक खास तरह की प्रजाति से बना है। इस प्रजाति को कहते हैं लोकस्ट कॉकरोच (नोफीटा सिनेरा) और ये उत्तर अफ्रीका में मिलता है।ये आसानी से बढ़ते हैं और इनका प्रजनन भी जल्दी होता है लेकिन सवाल ये उठता है कि दुनिया में हजारों तरह के कीड़े-मकोड़े हैं, खाने के लिए कॉकरोच ही क्यों?
दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में ये भोजन का अहम हिस्सा बन चुके हैं
लेकिन तस्वीर में जो ब्रेड है वो आपके-हमारे किचन में दिखने वाले आम कॉकरोच से नहीं बना है बल्कि एक कॉकरोच की एक खास तरह की प्रजाति से बना है। इस प्रजाति को कहते हैं लोकस्ट कॉकरोच (नोफीटा सिनेरा) और ये उत्तर अफ्रीका में मिलता है।ये आसानी से बढ़ते हैं और इनका प्रजनन भी जल्दी होता है लेकिन सवाल ये उठता है कि दुनिया में हजारों तरह के कीड़े-मकोड़े हैं, खाने के लिए कॉकरोच ही क्यों?
Cockroach bread
इसका मुख्य कारण है -
ये प्रोटीन के लिए रेड मीट से भी बेहतर उपाय है। जहां रेड मीट का 50 फीसदी हिस्सा प्रोटीन होता है। इसका 70 फीसदी सिर्फ प्रोटीन होता है। कॉकरोच हजारों सालों से दुनिया में हैं और इस कारण इवोल्यूशन के पूरे दौर से होते हुआ आज के दौर तक पहुंचे हैं। दक्षिण ब्राजील के फेडेरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ रियो ग्रांद में फूड इंजीनियर आंद्रीसा जेन्तजेन कहती हैं, "वातावरण से तालमेल मिलाने और लाखों सालों तक जिंदा रहने के लिए कॉकरोचों ने जरूर कुछ खास गुण अपनाए होंगे।"
ये प्रोटीन के लिए रेड मीट से भी बेहतर उपाय है। जहां रेड मीट का 50 फीसदी हिस्सा प्रोटीन होता है। इसका 70 फीसदी सिर्फ प्रोटीन होता है। कॉकरोच हजारों सालों से दुनिया में हैं और इस कारण इवोल्यूशन के पूरे दौर से होते हुआ आज के दौर तक पहुंचे हैं। दक्षिण ब्राजील के फेडेरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ रियो ग्रांद में फूड इंजीनियर आंद्रीसा जेन्तजेन कहती हैं, "वातावरण से तालमेल मिलाने और लाखों सालों तक जिंदा रहने के लिए कॉकरोचों ने जरूर कुछ खास गुण अपनाए होंगे।"
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Cockroach bread
प्रोटीन से भरे ब्रेड
फूड इंजीनियर लॉरेन मेनेगन के साथ मिल कर जेन्तजेन कॉकरोचों को सुखा कर उनका आटा बनाने में कामयाब हुईं। इस आटे की कीमत थी 51 अमरीकी डॉलर (यानी 3,700 रुपए) प्रति किलो लेकिन ब्रेड बनाने के लिए कॉकरोच के आटे का मात्र 10 फीसदी ही इस्तेमाल हुआ, इसे साधारण गेंहू के आटे में मिलाया गया। हालांकि इससे भी काम नहीं बना।जेन्तजेन ने बताया, "थोड़ी मात्रा में इसे मिलाने भर से आटे में प्रोटीन 133 फीसदी तक बढ़ गई।" 100 ग्राम घर में बना साधारण ब्रेड अगर 9.7 ग्राम प्रोटीन दे सकता है, इसकी तुलना में कॉकरोच ब्रेड में 22.6 ग्राम प्रोटीन होता है।
शोधकर्ता बताते हैं कि, "हम इस रेसिपी में फैट यानी तेल की मात्रा को 68 फीसदी तक कम करने में कामयाब हो गए हैं।"उनका दावा है कि स्वाद के मामले में ये सौ फीसदी आटे से बने साधारण ब्रेड जैसा ही होता है।वो कहते हैं, "हमने ब्रेड के स्वाद, टेक्सचर, ख़ुशबू और रंग की भी अच्छे से जांच की है और हमने पाया है कि ये साधारण ब्रेड के जैसा ही है। हां कुछ लोगों को ये इसमें पीनट की ख़ूशबू आ सकती है।"
फूड इंजीनियर लॉरेन मेनेगन के साथ मिल कर जेन्तजेन कॉकरोचों को सुखा कर उनका आटा बनाने में कामयाब हुईं। इस आटे की कीमत थी 51 अमरीकी डॉलर (यानी 3,700 रुपए) प्रति किलो लेकिन ब्रेड बनाने के लिए कॉकरोच के आटे का मात्र 10 फीसदी ही इस्तेमाल हुआ, इसे साधारण गेंहू के आटे में मिलाया गया। हालांकि इससे भी काम नहीं बना।जेन्तजेन ने बताया, "थोड़ी मात्रा में इसे मिलाने भर से आटे में प्रोटीन 133 फीसदी तक बढ़ गई।" 100 ग्राम घर में बना साधारण ब्रेड अगर 9.7 ग्राम प्रोटीन दे सकता है, इसकी तुलना में कॉकरोच ब्रेड में 22.6 ग्राम प्रोटीन होता है।
शोधकर्ता बताते हैं कि, "हम इस रेसिपी में फैट यानी तेल की मात्रा को 68 फीसदी तक कम करने में कामयाब हो गए हैं।"उनका दावा है कि स्वाद के मामले में ये सौ फीसदी आटे से बने साधारण ब्रेड जैसा ही होता है।वो कहते हैं, "हमने ब्रेड के स्वाद, टेक्सचर, ख़ुशबू और रंग की भी अच्छे से जांच की है और हमने पाया है कि ये साधारण ब्रेड के जैसा ही है। हां कुछ लोगों को ये इसमें पीनट की ख़ूशबू आ सकती है।"
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Cockroach
न्यूट्रीशन प्रोफेसर इनो विएरा इंसान के भोजन में कीड़ों-मकोड़ों के इस्तेमाल के मामलों में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी रखते हैं। वो कहते हैं, "झींगुर, ततैया, चींटियां, तितली, रेशम के कीड़े और बिच्छु ऐसे कई कीड़े हैं जो हमारे खाने का हिस्सा बन सकते है।"
"हम कीड़ों को क्यों अपने खाने में अपना नहीं पाते इसके पीछे हमारी सांस्कृतिक समस्याएं हैं।"वो कहते हैं कि अपने भोजन में कीड़ों को अपनाने से पारंपरिक खाने के स्रोतों पर पड़ रहा दवाब भी कम होगा।"हमें एक किलो मीट के उत्पादन के लिए 250 वर्ग मीटर की जमीन की जरूरत होती है जबकि इसी मात्रा में कीड़ों को पालने के लिए हमें केवल 30 वर्गमीटर जमीन की जरूरत पड़ती है। साथ ही पानी भी बचेगा क्योंकि एक किलो कीड़ों के लिए जहां एक हजार लीटर पानी की दरकार है, इतने मीट के लिए 20 हज़ार लीटर पानी की जरूरत होती है।"
इंसेक्ट ब्रीडर के लिए ब्राजील के संघ का कहना है कि भोजन बन सकने वाले कीड़ों की सबसे अधिक प्रजातियां (95 प्रजातियां) यहां पाई जाती हैं।
"हम कीड़ों को क्यों अपने खाने में अपना नहीं पाते इसके पीछे हमारी सांस्कृतिक समस्याएं हैं।"वो कहते हैं कि अपने भोजन में कीड़ों को अपनाने से पारंपरिक खाने के स्रोतों पर पड़ रहा दवाब भी कम होगा।"हमें एक किलो मीट के उत्पादन के लिए 250 वर्ग मीटर की जमीन की जरूरत होती है जबकि इसी मात्रा में कीड़ों को पालने के लिए हमें केवल 30 वर्गमीटर जमीन की जरूरत पड़ती है। साथ ही पानी भी बचेगा क्योंकि एक किलो कीड़ों के लिए जहां एक हजार लीटर पानी की दरकार है, इतने मीट के लिए 20 हज़ार लीटर पानी की जरूरत होती है।"
इंसेक्ट ब्रीडर के लिए ब्राजील के संघ का कहना है कि भोजन बन सकने वाले कीड़ों की सबसे अधिक प्रजातियां (95 प्रजातियां) यहां पाई जाती हैं।