रोजमर्रा के जीवन में कई सारी एक्सेसरीज हमारे काम आती हैं। अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से हम इनका उपयोग करते हैं। चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस भी ऐसी ही एक एक्सेसरी हैं। इन दोनों का उपयोग आंखों की देखने की क्षमता को मजबूती देने या सुधारने के लिए किया जाता है। हालांकि आजकल बहुत खूबसूरत और स्टाइलिश चश्मे भी ट्रेंड में हैं, वही अक्सर लुक्स को थोड़ा और स्पेशल टच देने, ग्लैमरस रखने और सुविधा के लिहाज से कॉन्टैक्ट लेंसेस का उपयोग भी काफी किया जाता है।
जरूरी बात: आंखों की समस्या से हैं परेशान? ऐसे जानिए आपके लिए कॉन्टैक्ट लेंस बेहतर है या चश्मे?
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कॉन्टैक्ट लेंसेस
पतली सी प्लास्टिक या कांच की एक डिस्क जो आपकी आंखों में सीधे लगाई जाती है। चश्मे आंखों से थोड़ी दूरी पर रहते हैं लेकिन कॉन्टैक्ट लेंस आंखों के भीतर लगाए जाते हैं। ये फैशन ट्रेंड को फॉलो करने के लिए भी प्रयोग में लाए जाते हैं और आंखों के नम्बर को सपोर्ट करने के लिए भी। मुख्यतः दो प्रकारों के लेंसेस उपयोग में लाये जाते हैं- सॉफ्ट और हार्ड। ज्यादातर प्लास्टिक से बने सॉफ्ट लेंसेस ही उपयोग में लाए लाते हैं।
हार्ड लेंसेस, सॉफ्ट लेंसेस की तुलना में अधिक टिकाऊ होते हैं लेकिन ये आरामदायक कम होते हैं। एलर्जी की स्थिति में भी हार्ड लेंसेस अधिक अच्छा विकल्प हो सकते हैं।
इन बातों को रखें ध्यान में-
- लेंसेस चाहे हार्ड हों या सॉफ्ट, अगर आंखों के नम्बर के हिसाब से आप इसे ले रहे हैं तो कोशिश करें कि पूरी जांच के बाद खरीदें।
- कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वालों के लिए इंफेक्शन एक आम समस्या होती है। आंकड़े बताते हैं कि अमूमन हर 500 में से एक कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले व्यक्ति को आंखों के गम्भीर संक्रमण की आशंका हो सकती है। इसलिए इन्हें उपयोग करते समय साफ-सफाई और हाइजीन का पूरा ध्यान रखें।
- लगातार लेंसेस का प्रयोग ड्राय आइज या अधिक संवेदनशील आंखों की स्थिति बना सकता है। अपने डॉक्टर से इस संदर्भ में पूरी जानकारी लें और उनके बताए तरीकों का पालन करें।
चश्मे के बारे में जानिए
चश्मों के साथ सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी फ्रेम और कांच दोनों ही आंखों से कुछ दूरी पर होते हैं। इसलिए आंखों को सीधे नुकसान पहुंचने का खतरा कम हो जाता है। इतना ही नहीं फ्रेम से लेकर ग्लासेस के शेप और स्टाइल तक चुनने के लिए आपके पास ढेरों विकल्प होते हैं। अच्छी देखभाल करने पर चश्मे बहुत लंबे समय तक चलते भी हैं। ये लेंसेस की तुलना में सस्ते भी होते हैं। संक्रमण की आशंका इनमें कम से कम होती है।
इन बातों का रखें ध्यान
- यदि आप लम्बे समय तक कम्प्यूटर पर काम करते हैं, धूप में रहते हैं या लंबी दूरी तक गाड़ी चलाते हैं, तो चश्मों में आपको इसके हिसाब से ग्लासेस आसानी से मिल सकते हैं। इनमें हानिकारक यूवी किरणों से लेकर कम्प्यूटर स्क्रीन से निकलने वाली किरणों तक से बचाव हो सकता है।
- ये आंखों पर सीधे स्ट्रेन पड़ने और संक्रमण होने से भी रक्षा कर सकते हैं।
- कई बार चश्मों की वजह से पेरिफेरल विज़न मतलब साइड में देखने की क्षमता बाधित भी हो सकती है।
- आउटडोर या स्पोर्ट एक्टिविटी के लिहाज से अधिकांशतः चश्मे मुश्किल खड़ी करने वाले हो सकते हैं।
- कॉन्टैक्ट लेंस लगवाने के बाद डॉक्टर से साल में कम से कम 2 बार चैकअप जरूर करवाएं।
- चश्मे के लिए साल में एक बार चैकअप से भी काम चल जाएगा।
- देखभाल की नियमित जरूरत चश्मे में भी होती है। इसपर पड़ने वाले स्क्रैच आदि आंखों की रौशनी पर बुरा असर डाल सकते हैं।
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अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।