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बड़ी चिंता: महामारी के दौरान बच्चों को नहीं मिल पाए जरूरी टीके, भविष्य में संक्रामक बीमारियों का जोखिम बढ़ा

Abhilash Srivastava अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Fri, 17 Feb 2023 01:12 PM IST
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million children missed out on basic vaccines during covid pandemic, know what will be its effects on health
कोरोना काल में बच्चों का टीकाकरण - फोटो : Amarujala graphic

पिछले तीन साल से जारी वैश्विक कोरोना महामारी के चलते लोगों को न सिर्फ गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा, साथ ही संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों में साल भर बाद भी लॉन्ग कोविड का खतरा देखा जा रहा है। कोरोना को लेकर हुए तमाम अध्ययनों से पता चलता है कि लॉन्ग कोविड में फेफड़े-हृदय रोगों सहित ब्लड क्लॉटिंग, कमजोरी और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की दिक्कतें देखी जा रही हैं।



कोरोना महामारी, बीमारियों का कारण बनने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी काफी चुनौतीपूर्ण स्थिति रही है, जिसके कारण पहले से ही कई क्रोनिक बीमारियों के शिकार लोगों को उचित इलाज नहीं मिल पाया, जरूरी सर्जरी में देरी हुई, जिसके चलते जटिलताएं पहले से अधिक हो गईं।

कोरोना को लेकर हुए अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने पाया कि वैसे तो संक्रमण का असर बच्चों में काफी कम रहा है, हालांकि इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड (प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर) या जन्मजात क्रोनिक बीमारियों के शिकार बच्चों में भी संक्रमण के कारण दिक्कतें देखी गईं। महामारी का सबसे ज्यादा असर बच्चों के प्राथमिक देखभाल और टीकाकरण पर हुआ। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि महामारी के दौरान बड़ी संख्या में बच्चों को जरूरी टीके नहीं मिल पाए, जिसके कारण उनमें दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है।

यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रन इमरजेंसी फंड (यूनीसेफ) बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य को लेकर प्रयासरत है। यूनिसेफ इंडिया और अमर उजाला फाउंडेशन की भागीदारी के तहत हमने भोपाल में पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ रोहित जोशी और ग्रेटर नोएडा स्थित अस्पताल में इंटरनेल मेडिसिन और कोरोना संक्रमितों का इलाज कर रहे डॉ श्रेय श्रीवास्तव से बातचीत कर स्थिति की जटिलताओं को समझने की कोशिश की। 

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महामारी ने बच्चों के टीकाकरण में डाली बाधा - फोटो : iStock

महामारी के दौरान जरूरी टीकाकरण में आई बाधा

वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के दौरान बच्चों के नियमित टीकाकरण में बाधा देखी गई। जन्म से लेकर दो साल तक बच्चों को आवश्यक टीके दिए जाते हैं जो उनमें गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए प्रतिरक्षा बनाने में मदद करती है। कोरोना संक्रमण के दौरान, विशेषकर पहली-दूसरी लहर में लोग घरों में बंद रहे, जिसके कारण बच्चों को आवश्यक टीके नहीं मिल पाए। 

डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ द्वारा प्रकाशित आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2020 में 23 मिलियन (2.3 करोड़) बच्चे नियमित टीकाकरण से वंचित रह गए। भारत सहित दुनियाभर के देशों में यह समस्या देखी गई। बच्चों को शुरुआती वैक्सीन न मिल पाने के कारण उनमें भविष्य में संक्रामक बीमारियों का खतरा अधिक देखा जा रहा है।
 

  • डीटीपी की पहली डोज न लेने वालों में भारत सबसे आगे


डीटीपी- डिप्थीरिया, टेटनस और पर्टुसिस (काली खांसी) से सुरक्षा देने वाली वैक्सीन है। इसकी पांच खुराक 2, 4 और 6 महीने, 15-18 महीने और 4-6 साल में दी जाती है।
 

यूनिसेफ के आंकड़ों से पता चलता है कि जिन बच्चों को इसके शुरुआती डोज नहीं मिल पाएं हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है। साल 2019 में भारत में 14.03 लाख बच्चे शुरुआती खुराक से वंचित थे, यह आंकड़ा अगले साल बढ़कर 30.38 लाख हो गया। इसके बाद के देशों में दूसरे स्थान पर पाकिस्तान और फिर इंडोनेशिया, फिलिपिंस, मैक्सिको और मोज़ाम्बिक है।


बाल रोग विशेषज्ञ डॉ रोहित बताते हैं,  साल 1920 के दशक के दौरान, डिप्थीरिया के कारण हजारों मौतें हो जाती थीं। डिप्थीरिया बैक्टीरिया का संक्रमण रक्त में विषाक्तता पैदा करता है, जो हृदय, किडनी और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती है। वैक्सीनेशन इस जोखिम को कम कर देती है। 

कोरोना के कारण टीकाकरण में आई बाधा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस ने कहा था, ''जब पूरी दुनिया कोविड-19 के टीकों के लिए संघर्ष कर रही थी उसी दौरान हम बच्चों के लिए आवश्यक अन्य टीकाकरण में पीछे छूट गए, जिससे भविष्य में बच्चों को खसरा, पोलियो जैसी बीमारियों का खतरा हो सकता है। बच्चों के टीकाकरण में तेजी लाना और हर बच्चे को जल्द टीका मिले यह सुनिश्चित करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।''
 

  • समय पर टीकाकरण न होने के क्या नुकसान हो सकते हैं?

डॉ रोहित जोशी कहते हैं, जन्म के बाद से ही टीकाकरण की शुरुआत हो जाती है, ये टीके उन्हें पोलियो, हैपेटाइटस-बी, खसरा, जैसी गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए जरूरी होते हैं। कुछ दशक पहले तक इनमें से कई बीमारियों के कारण मृत्युदर अधिक देखा जा रहा था, हालांकि टीकाकरण के माध्यम से समय के साथ इसमें काफी नियंत्रण पा लिया गया है। 

महामारी के दौरान संक्रमण के जोखिम के कारण स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं, जिससे बड़ी संख्या में नवजात को आवश्यक टीके नहीं मिल पाए। इससे बीमारियों के खिलाफ बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने में कमी आ सकती है, जो उन्हें भविष्य में संक्रामक बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना सकती है। इस तरह के खतरे से बचाव के लिए संक्रमण की रफ्तार कम होने के साथ ही छूटे बच्चों को टीके दिए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
 

  • जिन बच्चों का टीकाकरण छूट गया है उनके माता-पिता क्या करें?

डॉ रोहित बताते हैं, कोविड की रफ्तार कम होने के बाद ज्यादातर माता-पिता ने वैक्सीनेशन को कैचअप तो कर लिया है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर चुनौतियां हो सकती हैं। शुरुआत के 12 माह के टीके समय पर लगवाने चाहिए, डेढ़ साल के बाद के अधिकतर टीके, बूस्टर डोज के तौर पर दिए जाते हैं।

जिन बच्चों का कोविड के दौरान वैक्सीनेशन नहीं हो पाया है उन्हें जल्द से जल्द टीके लगवाए जाने चाहिए। कुछ टीके जन्म के बाद ही लगा दिए जाते हैं, शेष बचे वैक्सीन को जल्द लगवाया जाना चाहिए।

शहरी क्षेत्रों में टीकाकरण की रफ्तार में तेजी आई और महामारी के दौरान छूटे ज्यादातर बच्चों का वैक्सीनेशन हो गया है, हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी बड़ी बाधा बन रही है। इसपर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

 

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बच्चों में कोरोना का खतरा (सांकेतिक) - फोटो : istock

कोरोना संक्रमण का बच्चों पर असर

दुनियाभर में कोरोना संक्रमण का लोगों की सेहत पर गंभीर असर देखा गया। हालांकि ज्यादातर रिपोर्ट्स बताती हैं कि बच्चों पर इसका असर कम रहा है। सिर्फ उन बच्चों में खतरा अधिक था जिनकी इम्युनिटी बहुत कमजोर थी, या जन्मजात वह गंभीर बीमारियों के शिकार थे। 
 

  • क्या बच्चों में भी रिपोर्ट किए गए संक्रमण के गंभीर मामले?

कोरोना संक्रमितों का इलाज कर रहे डॉ श्रेय श्रीवास्तव कहते हैं, संक्रमण की तीनों लहरों में बच्चों में इसका खतरा कम देखा गया। जो बच्चे संक्रमित भी हुए वह सामान्य उपचार से जल्दी ठीक भी हो गए। इंटेंसिव केयर या फिर अस्पतालों में भर्ती होने के मामले बच्चों में कम देखे गए। संभवत: यह उनमें प्राकृतिक एंटीबॉडीज के कारण था। कोरोना महामारी के दौरान बच्चों को संक्रमण के कैरियर के तौर पर जरूर माना जा रहा था, हालांकि संक्रमण की गंभीरता का असर उनमें कम देखा गया।
 

  • क्या बच्चों में भी लॉन्ग कोविड का जोखिम है?

तमाम अध्ययनों में संक्रमण का शिकार रहे लोगों में लॉन्ग कोविड का खतरा बताया जा रहा है, ऐसे में सवाल उठता है कि जो बच्चे संक्रमित रहे हैं, क्या उनमें भी इसका जोखिम हो सकता है? इस बारे में डॉ श्रेय कहते हैं, बच्चों में लॉन्ग कोविड के मामले फिलहाल नहीं देखे जा रहे हैं। चूंकि बच्चों में गंभीर रोग का खतरा कम था ऐसे में इसकी आशंका भी कम है कि उनमें लॉन्ग कोविड का जोखिम होगा।

चूंकि कोरोना का खतरा वैश्विक स्तर पर अब भी जारी है, कई देशों में वैरिएंट्स में म्यूटेशन की खबरें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में सुरक्षात्मक तौर पर सभी बच्चों का कोविड वैक्सीनेशन भी जरूरी है। देश में कई टीके मौजूद हैं जिन्हें बच्चों के लिए मंजूरी मिली है। भविष्य में कोरोना के खतरे से बचाव के लिए वैक्सीनेशन जरूर करा लें।

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बच्चों को संक्रामक बीमारियों से बचाएं - फोटो : Pixabay

कोविड के दुष्प्रभाव और 

कोरोना वायरस का संक्रमण तीन साल में लोगों के लिए कई प्रकार की समस्याओं का कारण बना है। बच्चों में भले ही संक्रमण के कारण बीमारियों का जोखिम कम था, पर उनमें महामारी के कई प्रकार के दुष्प्रभाव जरूर देखे गए हैं।

डॉ रोहित जोशी बताते हैं, महामारी के बाद बच्चों में विकासात्मक समस्याएं जरूर बढ़ी हैं, कई बच्चों में ऑटिज्म की दिक्कत देखी गई है। ऑटिज्म, मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है जो बच्चों के सामाजिक व्यवहार और व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। चूंकि महामारी के दौरान ज्यादातर समय बच्चे घरों में कैद रहे, साथी बच्चों से मिलना-जुलना, खेलना कम हो पाया जिसके कारण उनका अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। इसके चलते अब बच्चों में डर, झिझक जैसी समस्याएं देखी जा रही है। नए लोगों से मिलने में बच्चे संकोच कर रहे हैं, यह दीर्घकालिक तौर पर व्यक्तित्व की समस्याओं का कारण बनने वाली स्थिति है जिसपर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

डॉ श्रेय कहते हैं, महामारी के दुष्प्रभाव के रूप में बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामले भी बढ़े हुए रिपोर्ट किए गए हैं। मानसिक विकारों जैसे चिंता-तनाव, भय के कारण न सिर्फ उनका सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है, साथ ही इसके कई प्रकार के शारीरिक दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए सभी माता-पिता को इस प्रकार की जोखिमों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।


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नोट:
यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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