Medically Reviewed by Dr. Rajan Gandhi
जनरल फिजिशियन, चाइल्डकेयर हॉस्पिटल, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल
डिग्री- एम.बी.बी.एस, डिप्लोमा सी.एच
अनुभव- 25 वर्ष
कोरोना के अलावा भी दुनिया में ऐसी कई बीमारियां हैं, जो बेहद ही संक्रामक और जानलेवा हैं। ऐसी ही एक बीमारी है मेनिंगोकोकल मेनिंजाइटिस। यह एक संक्रामक, लेकिन दुर्लभ बीमारी है। कोरोना की तरह ही इसका संक्रमण भी संक्रमित मरीज के खांसने या छींकने से हवा की सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। इसका संक्रमण मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के आसपास की सुरक्षात्मक परत को प्रभावित करता है। आइए जानते हैं कि यह बीमारी कैसे फैलती है, इसके लक्षण क्या हैं और इस बीमारी का खतरा किन्हें ज्यादा है?
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मेनिंगोकोकल मेनिनजाइटिस: कमजोर इम्यूनिटी वालों के लिए जानलेवा है यह बीमारी, दो दिन में हो जाती है मरीज की मौत
Mon, 31 May 2021 02:42 PM IST
सोनू शर्मा
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सोनू शर्मा
Updated Mon, 31 May 2021 02:42 PM IST
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कैसे फैलती है यह बीमारी?
- विशेषज्ञ कहते हैं कि मेनिंगोकोकल एक प्रकार का संक्रमण है, जो नाइसीरिया मेनिनजाइटिडिस नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। इसके संक्रमण का भी हाल कुछ-कुछ कोरोना वायरस की तरह ही है, यानी कई लोगों के शरीर में मेनिंगोकोकल के बैक्टीरिया मौजूद होते हैं और वो बीमार नहीं पड़ते हैं, लेकिन दूसरों को वो संक्रमित जरूर कर सकते हैं।
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मेनिंगोकोकल मेनिंजाइटिस के लक्षण क्या हैं?
- बुखार
- सिर दर्द
- गर्दन में अकड़न
- रोशनी या प्रकाश से संवेदनशीलता
- उलझन
- पेट खराब
- उल्टी
- चिड़चिड़ापन
- भूख न लगना
- मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को ढकने वाली परत में सूजन
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इस बीमारी का खतरा किन्हें ज्यादा?
- वैसे तो यह बीमारी किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन इसा ज्यादा खतरा पांच साल से कम उम्र के बच्चों, किशोरों और युवा वयस्कों को होता है। उनमें यह बीमारी ज्यादा देखी गई है। इसके अलावा रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी की कमी वाले व्यक्तियों को भी इसका ज्यादा खतरा होता है।
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कितनी खतरनाक है यह बीमारी?
- मेनिंगोकोकल मेनिंजाइटिस से होने वाली मृत्यु की दर काफी ऊंची है, अगर मरीज का समय पर इलाज नहीं हुआ तो यह दर 50 फीसदी तक हो सकती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह बीमारी बहुत जल्दी जानलेवा बन जाती है। इसके लक्षण की शुरुआत के बाद 24 से 48 घंटों के अंदर ही मरीजों की मौत हो जाती है और अगर लोग इस बीमारी से बच भी जाते हैं, तो उनमें से अधिकांश को दिमागी नुकसान, बहरापन, घाव और अंग कटने जैसी गंभीर जटिलताओं के साथ जीना पड़ सकता है।