बच्चे के जन्म के पहले साल में पारिवारिक परिवेश बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चे के पहले साल में ही घर के माहौल से इस बात का निर्धारण हो जाता है कि बच्चा किस तरह भावनात्मक रूप से विकसित होगा। शिशु के सकारात्मक मानसिक विकास में इस माहौल का महत्वपूर्ण योगदान है। पारिवारिक तंत्र का बच्चे के विकास पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। विशेषकर पहले कुछ सालों में बच्चे का मां के साथ किस तरह का रिश्ता रहता। मां के साथ रहकर ही शिशु परिवार के महत्व जान पाता है। इस दौरान बच्चे में भावनात्मक विकास भी होता है और वह माहौल में अपने आप को ढालना सीखता है। इसी मुद्दे को लेकर एक शोध की गई है। आइए जानते हैं क्या कहती है शोध?
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फिनलैंड के टैंपेयर विश्वविद्यालय में हुए एक शोध के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान जिस तरह का माहौल परिवार में होता है, बच्चा खुद को उसी तरह से ढालना शुरू कर देता है। गर्भावस्था से लेकर जन्म लेने के बाद एक वर्ष तक का पारिवारिक वातावरण बच्चे के भावनात्मक विकास में अहम भूमिका निभाता है। इस शोध में बच्चों के भावनात्मक विकास पर मां और बच्चे के बीच शुरुआती रिश्ते के साथ परिवार प्रणाली के महत्व को समझाने की कोशिश की गई है।
शोधकर्ता जालू लिंडब्लॉम के अनुसार, ऐसी संभावना है कि बच्चे अपने पारिवारिक माहौल के अनुकूल खुद को ढालने के लिए अपनी भावनात्मक रणनीति विकसित करते हैं। बच्चे के द्वारा खुद को इस तरह ढालने की प्रक्रिया से बाद में मानसिक विकार और सामाजिक संबंध बनाने में होने वाली कठिनाइयों को समझा जा सकता है। शोध के लिए अलग-अलग पारिवारिक वातावरण वाले 10 वर्ष की आयु के 100 बच्चों पर अध्ययन किया गया। शोध के दौरान बच्चों को प्रसन्न और दुखी चेहरों वाली तस्वीरें दिखाई गईं।
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निष्कर्ष से पता चलता है कि माता-पिता किसी समस्या या उलझन का जिस संजीदगी से समाधान करते हैं उनकी संतान भी उसी अनुसार समस्याओं को सुलझाती है। गर्भावस्था के दौरान से ही बच्चे का मस्तिष्क भविष्य के लिए रणनीति विकसित करने लगता है
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उन परिवारों के बच्चे जहां माता-पिता के बीच संबंध मधुर नहीं हैं, जब उन बच्चों को नाराज चेहरे वाली तस्वीरें दिखाई गईं तो भी कुछ समय में ही बच्चे ने अपने ध्यान को वहां से हटा लिया। मगर फिर भी बहुत देर तक यह बात बच्चे के मन में बनी रही। यह इस बात को दर्शाता है कि वो बच्चे वो ऐसे पारिवारिक माहौल से आए हैं, जहां पर मां-बाप संबंध अच्छे नहीं। नतीजन बच्चे नकारात्मक माहौल का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।