कोरोना वायरस का संक्रमण देश और दुनिया में बढ़ता ही जा रहा है। कोरोना से जारी जंग में देश में कई स्तर पर काम हो रहा है। देश में तीन वैक्सीन कैंडिडेट्स कामयाबी के करीब हैं। भारतीय बाजार में कोरोना के इलाज की दवाएं भी उपलब्ध हो गई हैं। वहीं दूसरी ओर कोरोना के घातक प्रभावों को बेअसर करने वाले प्लाज्मा पर भी काम हो रहा है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने हैदराबाद की फार्मास्युटिकल कंपनी बायोलॉजिकल ई. लिमिटेड के साथ मिलकर ऐसा ही प्लाज्मा 'एंटीसेरा' तैयार किया है। इसे घोड़ों में अक्रिय कोरोना वायरस (Inactive Sars Cov-2) का इंजेक्शन देकर विकसित किया गया है। अब इस दवा का इंसानों पर ट्रायल होगा।
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कोरोना वायरस
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भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक प्रोफेसर बलराम भार्गव के मुताबिक, कोरोना मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी के प्रभाव की जांच के दौरान इसके कारगर न साबित होने पर परिषद ने विकल्प के तौर पर 'हॉर्स सेरम' विकसित किया है। इसे 'एक्वाइन सेरम' भी कहा जाता है। इसके क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी भी मिल गई है। इंसानों पर पहले चरण के ट्रायल के लिए भारतीय शीर्ष दवा नियामक 'औषधि महानियंत्रक' से मंजूरी मिल गई है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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आईसीएमआर के अधिकारियों ने बताया कि घोड़ों में अक्रिय Sars-Cov-2 का इंजेक्शन देकर एंटीसेरा (Antisera) को विकसित किया गया है। आईसीएमआर के डीजी डॉक्टर बलराम भार्गव ने बताया कि एंटीसेरा का विकास आईसीएमआर ने हैदराबाद स्थित फार्मास्युटिकल कंपनी बायोलॉजिकल ई. लिमिटेड के साथ मिलकर किया है, जिसके क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति मिल गई है।
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आईसीएमआर
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डॉ. बलराम भार्गव ने कहा कि कोविड के मरीजों पर प्लाज्मा थेरेपी के प्रभाव का पता लगाने के लिए 22 अप्रैल से 14 जुलाई के बीच देश के 39 निजी और सरकारी अस्पतालों में 464 मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया। इसमें 350 से अधिक डॉक्टर शामिल हुए। परीक्षण में पता चला कि कोरोना के मध्यम और गंभीर मरीजों को प्लाज्मा थेरेपी का कोई लाभ नहीं हुआ। इससे न ही कोरोना संक्रमण के कम गंभीर मामलों को गंभीर होने से रोकने में मदद मिली।
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Coronavirus
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डॉ. भार्गव ने कहा कि प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के कारण मौत के मामले में भी गिरावट नहीं आई। प्लाज्मा थेरेपी के कारगर नसाबित नहीं होने के कारण विकल्प के रूप में 'हॉर्स सेरम' विकसित किया गया। इसका जानवरों पर परीक्षण सफल रहा है और अब इसके क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी भी मिल गई है। उन्होंने कहा कि आईसीएमआर के इस संबंध किए गए शोध की समीक्षा हो चुकी है और इसे शोधपत्र के रूप में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजी) में प्रकाशित किये जाने की स्वीकृति मिल गई है।