आज जलियांवाला बाग नरसंहार की 100वीं बरसी है। देश की आजादी के इतिहास में 13 अप्रैल का दिन एक दुखद घटना के साथ याद किया जाता है। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों भारतीयों पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये सभी जलियांवाला बाग में रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।
भारत मां के इस सपूत ने 21 साल बाद लिया था जलियांवाला बाग का बदला
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सरदार उधम सिंह ने जलियांवाला बाग नरसंहार का 21 साल बाद बदला लिया था। इस नरसंहार का बदला लेने के लिए सरदार उधम सिंह लंदन पहुंच गए। 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की एक बैठक में उधम सिंह ने माइकल ओ’ड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी थी। जिसके बाद उनको फांसी दी गई थी।
जलियांवाला बाग नरसंहार में मारे गए थे हजारों बेकसूर
13 अप्रैल 1919 को हजारों लोग रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। जनरल डायर करीब 100 सिपाहियों के सीथ बाग के गेट पर पहुंचा। उसके करीब 50 सिपाहियों के पास बंदूकें थीं। वहां पहुंचकर बिना किसी चेतावनी के उसने गोलियां चलवानी शुरु कर दीं। गोलियां चलते ही सभा में भगदड़ मच गई। जलियांवाला बाग कांड के समय माइकल ओ' ड्वायर पंजाब का गर्वनर था। और लोगों पर गोली चलवाने वाला जनरल डायर था।
कई इतिहासकारों का मानना है कि यह हत्याकांड ओ' ड्वायर व अन्य ब्रिटिश अधिकारियों का एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जो पंजाब पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए पंजाबियों को डराने के उद्देश्य से किया गया था। यही नहीं, ओ' ड्वायर बाद में भी जनरल डायर के समर्थन से पीछे नहीं हटा था।
गोलीबारी से घबराई बहुत सी औरतें अपने बच्चों को लेकर जान बचाने के लिए बाग में स्थित एक कुएं में कूद गईं। निकलने का रास्ता बंद होने के कारण बहुत से लोग भगदड़ में कुचले गए और हजारों लोग गोलियों की चपेट में आए। गोलीबारी के बाद कुएं से 200 से ज्यादा शव बरामद हुए थे।