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कहानी तिरहुत रेलवे की, जिसके अवशेष अब ढूंढे नहीं मिलेंगे

Sat, 19 Oct 2019 08:09 AM IST
बीबीसी Published by: योगेश साहू Updated Sat, 19 Oct 2019 08:09 AM IST
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The story of the Tirhut railway whose remains will no longer be found
तिरहुत रेलवे - फोटो : BBC

देश की पहली प्राइवेट ट्रेन 'तेजस एक्सप्रेस' की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन आजादी से पहले भारत में कई प्राइवेट रेल कंपनी चल रही थीं। तिरहुत रेलवे उनमें से एक थी जिसे दरभंगा स्टेट चला रहा था। 1874 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने तिरहुत रेलवे की शुरूआत की थी।



उस वक्त उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था। अकाल में राहत कार्य के लिए पहली ट्रेन 17 अप्रैल 1874 को वाजितपुर (समस्तीपुर) से दरभंगा तक चली। ये मालगाड़ी थी और इस पर अनाज लादा गया था। बाद में वाजितपुर से दरभंगा तक के लिए पैसेंजर ट्रेन चली।

The story of the Tirhut railway whose remains will no longer be found
तिरहुत रेलवे - फोटो : BBC

तिरहुत रेलवे का सफर

तिरहुत रेलवे का सफर, भारत में रेलवे का सफर शुरू होने के दो दशक बाद यानी 1874 से शुरू हुआ। पूरे उत्तर बिहार में इसका जाल फैला हुआ था।  

1875 में दलसिंहसराय से समस्तीपुर, 1877 में समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर, 1883 में मुजफ्फरपुर से मोतिहारी, 1883 में ही मोतिहारी से बेतिया, 1890 में दरभंगा से सीतामढ़ी, 1900 में हाजीपुर से बछवाड़ा, 1905 में सकरी से जयनगर, 1907 में नरकटियागंज से बगहा, 1912 में समस्तीपुर से खगड़िया आदि रेलखंड बनाए गए।

The story of the Tirhut railway whose remains will no longer be found
तिरहुत रेलवे - फोटो : BBC

बिहार के सोनपुर से अवध (उत्तरप्रदेश का इलाका) के बहराइच तक रेल लाइन बिछाने के लिए 23 अक्तूबर 1882 को बंगाल और नार्थ वेस्टर्न रेलवे का गठन किया गया। इस बीच 1886 में अवध के नवाब अकरम हुसैन और दरभंगा के राजा लक्ष्मीश्वर सिंह दोनों ही शाही परिषद के सदस्य चुने गए।

जिसके बाद 1886 में अवध और तिरहुत रेलवे में ये समझ बनी कि दोनों क्षेत्रों के बीच आना-जाना सुगम किया जाए। बाद में 1896 सरकार और बंगाल और नार्थ वेस्टर्न रेलवे के बीच हुए एक करार के मुताबिक बंगाल और नार्थ वेस्टर्न रेलवे ने तिरहुत रेलवे के कामकाज को अपने हाथ में ले लिया।

 

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The story of the Tirhut railway whose remains will no longer be found
तिरहुत रेलवे - फोटो : BBC

कानून बनाने का प्रस्ताव

राज परिवार से संबंध रखने वाली कुमुद सिंह कहती हैं, दरअसल महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह किसानों की जमीन बेवजह रेलवे द्वारा अधिग्रहित किए जाने से नाराज थे इसलिए उन्होंने शाही परिषद, जो अब का राज्यसभा है, उसमें भूमि अधिग्रहण के लिए कानून बनाने का प्रस्ताव दिया। रेलवे के अंदर इस बात को लेकर नाराजगी थी जो 1896 में नार्थ वेस्टर्न रेलवे द्वारा तिरहुत रेलवे के कदम में दिखती है।

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तिरहुत रेलवे - फोटो : BBC

यात्रियों की सुविधा के लिए चलते थे स्टीमर

चूंकि रेल परिचालन जब शुरू हुआ तब गंगा नदी पर पुल नहीं बना था। जिसके चलते यात्रियों को नदी के एक छोर से दूसरे छोर पर जाने के लिए स्टीमर सेवा उपलब्ध कराई गई थी। तिरहुत स्टेट रेलवे के पास 1881-82 में चार स्टीमर थे जिसमें से दो पैडल स्टीमर 'ईगल' और 'बाड़' थे जबकि दो क्रू स्टीमर 'फ्लोक्स' और 'सिल्फ' थे।

ये स्टीमर बाढ़-सुल्तानपुर घाट के बीच और मोकामा-सिमरीया घाट के बीच चलते थे। दरभंगा स्टेट ने दरभंगा में तीन रेलवे स्टेशन बनाए। पहला हराही (दरभंगा) आम लोगों के लिए, दूसरा लहेरियासराय अंग्रेजों के लिए और तीसरा नरगौना टर्मिनल जो महाराज के महल नरगौना पैलेस तक जाता था।

यानी नरगौना पैलेस एक ऐसा महल था जिसके परिसर में रेलवे स्टेशन था। जो बाद में दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के अधीन हो गया।


 

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