ओ पनीरसेल्वम जे जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु के 19 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। जयललिता के बीमार होने के बाद पिछले ढाई महीनों से वह प्रदेश के कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका में थे। उन्हें जयललिता का सबसे करीबी और विश्वासपात्र माना जाता था।
पनीरसेल्वम: 'चाय की दुकान' से 'अम्मा का उत्तराधिकारी' बनने तक का सफर
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ओ पनीरसेल्वम: 'चाय की दुकान' से 'अम्मा का उत्तराधिकारी' बनने तक का सफर
इसके बाद साल साल 2014 में कर्नाटक हाइकोर्ट ने जब जयललिता को सजा सुनाई तब जयललिता ने एक बार फिर पनीरसेल्वम पर विश्वास जताया। इस तरह वह दूसरी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। 2014 में उन्होंने तमिलनाडु के 17वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
वह 11 मई 2015 तक मुख्यमंत्री के पद पर रहे जब कनार्टक हाईकोर्ट ने आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में उन्हें बरी नहीं कर दिया। इसके बाद जयललिता 6वीं बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। जयललिता के मंत्रिमंडल के वह सबसे कद्दावर मंत्री थे। उनके पास वित्त, योजना, संसदीय कार्य, चुनाव, पासपोर्ट और प्रशासनिक सुधार जैसे मंत्रालय थे।
ओ पनीरसेल्वम: 'चाय की दुकान' से 'अम्मा का उत्तराधिकारी' बनने तक का सफर
साल 2006 में विधानसभा में हारने के बाद तमिलनाडु विधानसभा में दो सप्ताह तक प्रतिपक्ष के नेता रहे थे। वह पेरियाकुलम से विधायक निर्वाचित हुए थे। इसके बाद जयललिता तब विपक्ष की नेता बनी जब विधानसभा अध्यक्ष ने एआईएडीएमके के सभी विधायकों को सदन से निष्काषित कर दिया था। तब जयललिता ने सदन नहीं जाने का निर्णय किया था जिसे बाद में उन्होंने बदल दिया।
ओ पनीरसेल्वम: 'चाय की दुकान' से 'अम्मा का उत्तराधिकारी' बनने तक का सफर
14 जनवरी 1951 को जन्मे ओ पनीरसेल्वम एक चाय की दुकान चलाते थे। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि ओपीए का सिर्फ एक ही सपना था। वह सिर्फ पेरियाकुलम नगरपालिका का चेयरमैन बनना चाहते थे।
1996 में उनका यह सपना पूरा हो गया। इसके बाद उन्हें कई मंत्री पद मिले और ईश्वर के आशीर्वाद से उन्हें मुख्यमंत्री बनना भी नसीब हुआ। 1996 में वह नगर पालिका अध्यक्ष चुने गए थे। इस बार वह थेनी जिले की बोडनियाकन्नूर सीट से विधायक चुने गए हैं।
ओ पनीरसेल्वम: 'चाय की दुकान' से 'अम्मा का उत्तराधिकारी' बनने तक का सफर
1987 में जब सेलवम के प्रिय नेता एमजी रामचंद्रन नहीं रहे और अन्नाद्रमुक का विभाजन हो गया तो वह जानकी रामचंद्रन के साथ हो गए। लेकिन जब उन्होंने देखा कि जयललिता मजबूत होकर उभर रही हैं तो वह उनके साथ हो गए।
इसके बाद वह पूरी तरह जयललिता के प्रति समर्पित हो गए। इसी का उन्हें पुरस्कार मिला और वह मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे।