इन 11 सीटों पर पिछले 20 साल से चोट खा रही सपा-बसपा, इस बार बदलेगी किस्मत?
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लखनऊ
लखनऊ लोकसभा सीट पर भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती है। 1998, 1999 और 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी यहां से सांसद थे। उनके बाद यहां की जनता ने 2009 में लालजी टंडन और 2014 में राजनाथ सिंह को अपना प्रतिनिधि चुना। सपा-बसपा गठबंधन ने अब इस सीट से आज ही सपा में शामिल हुई पूनम सिन्हा को उतार दिया है।
कानपुर
कानपुर का हाल भी लखनऊ से मिलता जुलता है। 1999-2009 तक कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल यहां से सांसद रहे, लेकिन 2014 में मुरली मनोहर जोशी ने इसे अपने नाम कर लिया। इस बार कानपुर में कांग्रेस की तरफ से श्रीप्रकाश जायसवाल, भाजपा के सत्यदेव पचौरी और सपा के राम कुमार निषाद के बीच मुकाबला होगा।
वाराणसी
वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा लोकसभा सीट है। साल 2009 में यहां भाजपा के मुरली मनोहर जोशी ने जीत हासिल की थी, जबकि 2004 में कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार मिश्रा चुने गए थे। वहीं 1999 में भी वाराणसी पर भाजपा का ही कब्जा था, शंकर प्रसाद जायसवाल यहां से सांसद चुने गए थे। इस बार भी नरेंद्र मोदी ने यहां से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। हालांकि महागठबंधन ने अब तक यहां से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन अटकलों के अनुसार अगर कांग्रेस प्रियंका गांधी को मैदान में उतार देती है तो महागठबंधन की तकलीफेें और बढ़ जाएंगी।
बागपत
यहां से चौधरी चरण सिंह ने सात साल (1977 से 1984 तक) में तीन चुनाव जीते और चौधरी अजित सिंह ने 25 साल (1989 से 2014 तक) में छह बार प्रतिनिधित्व किया। पिछले 42 साल में चौधरी परिवार की बनकर रही बागपत सीट की सियासत ने दो बार भाजपा के लिए भी करवट बदली है। 1998 में भाजपा के सोमपाल शास्त्री ने और 2014 में भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह ने चौधरी अजित सिंह को हराया।
अटकलें लगाई जा रही हैं कि बागपत और मथुरा में भी सपा-बसपा का जीत पाना मुश्किल होगा, लेकिन रालोद के साथ गठबंधन का उन्हें फायदा मिल सकता है। बागपत में भाजपा के सत्यपाल सिंह के सामने रालोद प्रत्याशी जयंत चौधरी खड़े हैं।