कारगिल युद्ध को हुए 20 साल पूरे हो गए हैं लेकिन भारत के जांबाजों के वीरता की दास्तां आज भी हमारे जेहन में ताजा है। आज के ही दिन एक 'परमवीर' ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। जी हां, हम बात कर रहे हैं शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की जिन्हें उनके दोस्त और दुश्मन 'शेरशाह' के नाम से पुकारते थे।
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vikram batra
- फोटो : ADGPI- Indian Army
कारगिल के दौरान मेजर विक्रम बत्रा ने अद्वितीय शौर्य और रणकौशल का परिचय देते हुए न केवल समारिक रुप से महत्वपूर्ण कई चोटियों पर कब्जा किया बल्कि पाक सेना के मनोबल को भी कुचलकर रख दिया। बत्रा के नेतृत्व में ही 19 जून 1999 को भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से प्वाइंट 5140 छीन लिया था।
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परमवीर विक्रम बत्रा
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कारगिल युद्ध के दौरान लड़ाई की भीषणता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाक सेना पहाड़ों के उपर बनी बंकरों में छिपी थी जबकि भारतीय सेना नीचे खुली जगह से हमला कर रही थी। इसी कारण भारत को पाक सेना के मजबूत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
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परमवीर विक्रम बत्रा
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विज्ञान में स्नातक विक्रम बत्रा की सेना में ज्वॉइनिंग सीडीएस के जरिए सेना में हुई थी। जुलाई 1996 में उन्हें भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रवेश मिला और 6 दिसम्बर 1997 को 13 जम्मू और कश्मीर रायफल्स में लेफ्टिनेंट के पोस्ट पर उन्हें नियुक्ति मिली। जिसके बाद उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग भी ली।
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कारगिल युद्ध
- फोटो : सोशल मीडिया
तारीख एक जून 1999- विक्रम बत्रा की कमांडो टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प व राकी नाब को जीतने के बाद इन्हें पदोन्नति कर कैप्टन बना दिया गया। जिसके बाद श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सामरिक रूप से सबसे महत्त्वपूर्ण चोटी संख्या 5140 को पाक सेना से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा की टुकड़ी को मिली।