जब बात दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं की होती है तो हिंदी का नाम जरूर लिया जाता है। भाषाओं की बिंदी जैसे तमाम उपनाम इसके लिए दर्ज हैं, लेकिन सरकारी दफ्तर या आम बोलचाल में हिंदी बोलने और लिखने वालों को आज के वक्त में दोयम दर्जे का ही माना जाता है। इसके बावजूद देश में ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्होंने हिंदी को न सिर्फ अपनाया, बल्कि उससे सफलता की सीढ़ी भी चढ़ी। आज हिंदी दिवस पर हम आपको ऐसे ही लोगों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने सिर्फ हिंदी के दम पर कामयाबी की नई इबारत लिख दी।
हिंदी के दम पर दो बार क्लियर किया यूपीएससी
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विकास मीणा, आईएएस
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देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी में ज्यादातर छात्र हिंदी लेने से घबराते हैं। दरअसल, धारणा है कि हिंदी माध्यम के छात्रों को यूपीएससी में सफलता नहीं मिली, लेकिन राजस्थान के महवा से ताल्लुक रखने वाले विकास ने हिंदी के दम पर ही कामयाबी की नई इबारत लिख दी। बता दें कि विकास ने हिंदी मीडियम से ही दो-दो बार यूपीएससी क्लियर कर दिखाया। विकास पहली बार में आईपीएस चुने गए, लेकिन उनका सपना आईएएस बनना था। ऐसे में उन्होंने दूसरे प्रयास में भी हिंदी को ही हमसफर बनाया और अपनी मंजिल हासिल कर ली। विकास बताते हैं कि जब वह यूपीएससी की तैयारी करने दिल्ली आए थे तो उन्होंने हिंदी को लेकर छात्रों में मन में काफी डर देखा। हालांकि, उन्होंने हिंदी को अपना मुख्य हथियार बना लिया और सफलता की सीढ़ी चढ़ गए।
तीन पीढ़ियों से कर रहे हिंदी की सेवा
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अपनी दोनों बेटियों के साथ कृष्ण कुमार यादव
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हिंदी के विकास के लिए तमाम विद्वान, संस्थाएं और सरकारी विभाग अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। इनके बीच लखनऊ में रहने वाला एक परिवार ऐसा भी है, जो तीन पीढ़ियों से हिंदी की सेवा कर रहा है। दरअसल, लखनऊ में रहने वाले कृष्ण कुमार यादव भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उनके पिता शिव मूर्ति यादव ने हिंदी के विकास में काफी योगदान दिया, जिसे कृष्ण कुमार यादव ने आगे बढ़ाया। अब उनकी पत्नी आकांक्षा यादव और दोनों बेटियां अक्षिता व अपूर्वा भी अपने लेखन से हिंदी को लगातार नए आयाम दे रही हैं। हिंदी के प्रति इस परिवार की निष्ठा इतनी ज्यादा है कि देश-विदेश में इन्हें तमाम सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। वहीं, हिंदी ब्लॉगिंग में भी इस परिवार ने काफी नाम कमाया है।
हिंदी के प्रसार के लिए सीखीं कई भाषाएं
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किशोर श्रीवास्तव
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हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए तमाम लोग मशक्कत करते हैं, लेकिन दूसरे लोगों को इस भाषा की विशेषता समझाने में उन्हें काफी दिक्कतें भी आती हैं। दरअसल, कई बार दूसरी भाषाओं को बोलने वाले जब हिंदी वक्ताओं से रूबरू होते हैं तो दोनों एक-दूसरे की बातचीत ही नहीं समझ पाते। इस दिक्कत को दूर करने के लिए नोएडा में रहने वाले किशोर श्रीवास्तव ने अलहदा कदम उठाया। दरअसल, केंद्र सरकार में राजभाषा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त किशोर श्रीवास्तव का मानना है कि अगर हमें अपनी भाषा को सम्मान दिलाना है तो दूसरों की भाषा का भी सम्मान करना होगा। ऐसे में वह जब भी दूसरे देश जाते हैं तो पहले वहां की भाषा सीखते हैं। इसके बाद वहां के लोगों को हिंदी सिखाते हैं। किशोर श्रीवास्तव अब तक नेपाल, भूटान और म्यांमार जैसे देशों में घूम चुके हैं और अब दूसरे देशों में हिंदी सिखाने की योजना बना रहे हैं।
सोशल मीडिया पर भी बढ़ रहा हिंदी का क्रेज
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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आजकल के इंटरनेट युग में जितनी तेजी से सोशल मीडिया का क्रेज बढ़ा, उसका फायदा हिंदी को भी मिला। दरअसल, आज यूट्यूब हो या फेसबुक, हर प्लैटफॉर्म पर ऐसे तमाम व्लॉग (वीडियो फॉर्मेट) और पेज हैं, जो हिंदी भाषा पर ही आधारित हैं। यहां लोगों को हिंदी से संबंधित कंटेंट मिलता है, जिससे लोगों का रुझान इसके प्रति लगातार बढ़ रहा है।