साल 2019 में भारतीय जनता पार्टी ने नया कीर्तिमान रचा। वह पहली ऐसी गैर कांग्रेस पार्टी बनी जिसने लगातार दूसरी बार केंद्र की सत्ता हासिल की। लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अपना जादू बरकरार नहीं रख पाई। कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उसे करारे झटके लगे। महाराष्ट्र में शिवसेना ने उसे गच्चा दिया और झारखंड में वह बुरी तरह हारी। हरियाणा में किसी तरह गठबंधन की सरकार बना पाई। यानि उसने खोया ज्यादा, पाया कम।
साल 2020 में भी उसके सामने दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव की दो बड़ी चुनौतियां हैं। दिल्ली उसके लिए सम्मान की लड़ाई बन गया है। यहां भाजपा करीब दो दशकों से सत्ता से बाहर है। लगातार 15 साल यहां शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार रही और फिर 2015 में आम आदमी पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया। बिहार में भी भाजपा के लिए कम चुनौतियां नहीं हैं। जनता दल यू के साथ उसकी खटपट जगजाहिर है। उपर से महाराष्ट्र और झारखंड के नतीजों ने जदयू को मुखर होने का मौका दे दिया है।
केजरीवाल नजर आ रहे मजबूत
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अरविंद केजरीवाल
- फोटो : अमर उजाला
दिल्ली में भाजपा का मुकाबला अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बेहद मजबूत नजर आ रही आप से है। मुकाबले में कांग्रेस भी है जो यहां अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की लड़ाई लड़ रही है। 2015 चुनाव में आप की आंधी चली थी। उसने 70 में से 67 सीटों पर कब्जा जमाकर सभी को हैरान कर दिया था। भाजपा के पास न सीएम चेहरा है न कोई बड़ा मुद्दा। उसी एकमात्रा उम्मीद पीएम मोदी और अमित शाह ही हैं। वहीं, केजरीवाल एलान कर चुके हैं कि वह सिर्फ काम के आधार पर ही वोट मांगेंगे। उनके पास गिनाने के लिए काम हैं भी। मुफ्त बिजली-पानी जैसी आप सरकार की लोकप्रिया योजनाओं का भाजपा कैसे मुकाबला करेगी ये देखने वाली बात होगी।
बिहार में भाजपा के सामने कम चुनौतियां नहीं
बिहार में भाजपा के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं। भले ही जदयू एनडीए का घटक दल है, लेकिन दोनों दलों में लगातार तनातनी बनी रहती है। उसपर भाजपा के सामने महागठबंधन की भी चुनौती है। इसमें सबसे प्रमुख दल है लालू प्रसाद यादव की राजद और कांग्रेस। हाल ही में भाजपा झारखंड में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के सामने बुरी तरह मात खा चुकी है। 2014 लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा को सबसे पहला और बड़ा झटका बिहार में ही लगा था। हालांकि इस बार उसके साथ जदयू है, लेकिन ऊंट कब किस करवट बैठ जाए कहना मुश्किल है। इसके अलावा रामविलास पासवान की लोजपा भी उसके साथ है लेकिन उसके रुख के बारे में भी साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।
सहयोगी ही भाजपा को ले डूबे
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भाजपा-शिवसेना में सीटों पर बनी सहमति
इन सहयोगी दलों के साथ भाजपा की पटरी कितनी बैठ पाएगी, ये सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। महाराष्ट्र में शिवसेना और झारखंड में आजसू के साथ गठबंधन टूट गया था था, उसी तर्ज पर यहां भी भाजपा के हाथ से बाजी फिसल सकती है। सहयोगी दलों की नाराजगी की कीमत ही भाजपा ने इन राज्यों में चुकाई है। महाराष्ट्र में उसके हाथ आई बाजी फिसली तो झारखंड में पुराना साथी आजसू रूठ गया।
बिहार में भाजपा-जदयू के बीच कई बार तनातनी दिखी है। हाल ही में बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी और जदयू के महासचिव प्रशांत किशोर के बीच ट्विटर वार छिड़ गई थी। नागरिकता कानून पर बहस के बाद बात सीट शेयरिंग तक पहुंच गई। पीके ने कहा कि जदयू को ज्यादा सीटों पर लड़ना चाहिए, जबकि सुशील ने कहा कि इसका फैसला दोनों दलों के बड़े नेताओं के बीच बैठक के बाद होगा।
बिहार में सीट शेयरिंग से बनेगा समीकरण
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विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए चुनौती
- फोटो : पीटीआई
सियासी पंडितों का मानना है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल बेहद मजबूत स्थिति में हैं। वहीं, भाजपा के सामने पुराने आंकड़ों को दुरुस्त करने की चुनौती है। जबकि बिहार में टक्कर कड़ी है और अभी कहना मुश्किल है कि बाजी किस पार्टी के हाथ लगेगी। यहां सीट शेयरिंग पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। जदयू ज्यादा से ज्यादा सीटों की मांग करेगी, लोजपा भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहेगी, ऐसे में भाजपा के सामने दोहरा संकट होगा। महाराष्ट्र और झारखंड के घटनाक्रम को देखते हुए भाजपा को सख्त दबाव का सामना करना पड़ेगा। हिंदी भाषी राज्यों में अपना प्रभुत्व बरकरार रखने के लिए भाजपा को बिहार में सत्ता हासिल करनी ही होगी। वह पहले ही राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को गंवा चुकी है।