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हम 68वें गणतंत्र दिवस की ओर, मगर ये 5 कानून अंग्रेजों के जमाने के

Thu, 26 Jan 2017 12:04 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 26 Jan 2017 12:04 PM IST
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68th Republic Day 2017
68वां गणतंत्र दिवस मना रहे भारत में आज भी तमाम ऐसे कानून हैं, जो 100 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हो चुके हैं। देख‌िए 5 ऐसे कानून...

100 से 150 साल पुराने हैं ये कानून

68th Republic Day 2017

पिछले अड़सठ वर्षों से इनमें से कई कानूनों का उपयोग करने की तो नौबत ही नहीं आई है। दरअसल देश के कई प्रमुख कानूनों की जड़ें ब्रिटिश काल में ढूंढी जा सकती हैं। साफ है कि ये कानून 100 से 150 साल पुराने हैं।

 संसदीय लोकतंत्र में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद के पास होती है। लेकिन जब बात पुराने जर्जर कानूनों को ख्‍ात्म करने की हो तो संसद भी समय की कमी का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ती दिखाती है।

भारतीय विधि आयोग समय-समय पर अपनी रिपोर्टों के जरिये सरकार को ऐसे कानूनों को खत्म करने की सलाह देता आया है, लेकिन हर बार सरकारी उदासीनता आड़े आ जाती है। आइए, इनमें से कुछ प्रमुख कानूनों पर नजर डालें।

आईपीसीः भारतीय न्यायिक तंत्र की रीढ़

68th Republic Day 2017

1860 में जब इंडियन पीनल कोड बनाया गया, तो तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने शायद ही यह सोचा होगा कि 154 साल बाद भी यह भारतीय न्यायिक तंत्र की रीढ़ बना रहेगा।

आईपीसी भारत के भीतर (जम्मू और कश्मीर को छोड़कर) भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए अपराधों की परिभाषा और दंड का प्रावधान करती है। जम्मू और कश्मीर में इसे रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के नाम से जाना जाता है।

1862 में इसके लागू होने के बाद से समय-समय पर इसमें संशोधन किए गए हैं, लेकिन यह भी सच है कि वर्तमान परिस्थितियों से निपटने में ये काफी नहीं रहे हैं।

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पुलिस एक्ट, 1861

68th Republic Day 2017

तमाम बहसों के बावजूद भारत में पुलिस सुधार के नाम पर कोई खास पहल नहीं की जा सकी है। आज भी भारतीय पुलिस की जीवन रेखा 1861 के पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक ही चलती है।

गौरतलब है कि यह पुलिस अधिनियम 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद लाया गया था। दरअसल ब्रिटिश सरकार को भारतीयों से ऐसे ऐतिहासिक विद्रोह की कतई उम्मीद नहीं थी।

ऐसे समय में अंग्रेजों ने 1861 का पुलिस एक्ट पारित किया। भविष्य में किसी भी तरह के विद्रोह को रोकना ही इस एक्ट का एकमात्र उद्देश्य था।

जाहिर है, इसमें तमाम ऐसे प्रावधान जोड़े गए जो पुलिस को दमन की अतिरिक्त ताकत देते हों। लेकिन आज 'पुलिस राज्य' की जगह 'कल्याणकारी राज्य' ने ले ली है। समय के साथ-साथ अपराधों की परिधि में विस्तार हुआ है।

संगठित अपराध पुलिस के सामने कई चुनौतियां पेश कर रहे हैं। पुलिस को मानवीय चेहरा देने की वकालत करने वाले तो तमाम हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी राजनीति इच्छाशक्ति अब तक नहीं दिखी है।

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इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885

68th Republic Day 2017

1885 को केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए याद नहीं किया जाता। दरअसल इसी साल इंडियन टेलीग्राफ एक्ट भी अस्तित्व में आया था। यह इलेक्ट्रॉनिक क्रांति से पहले की घटना है। उस समय टेलीविजन जैसी किसी चीज का नाम तक लोगों ने नहीं सुना था।

इस एक्ट का उद्देश्य भारत में टेलीग्राफी, फोन, संचार, रेडियो, टेलेक्स और फैक्स के संचालन को सुगम बनाना था।

इसके अलावा इस एक्ट में तमाम ऐसे प्रावधान भी किए गए जो भारत में टेलीग्राफी और इससे जुड़ी बुनियादी संरचना पर ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत बनाते थे।

तब से लेकर आज तक इस एक्ट में तमाम संशोधन बेशक हुए हों, लेकिन आज इसके कई प्रावधान समयानुकूल नहीं रह गए हैं।

खासकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) और नई टेलीकॉम नीति की स्थापना ने इस एक्ट में गंभीर संशोधन की जरूरत जोर दिया है।

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