Movie Review: त्रिभंग
कलाकार: तनवी आजमी, काजोल, मिथिला पालकर, कुणाल रॉय कपूर, वैभव तत्ववादी, श्वेता मेहंदले, अंतरा देशपांडे, कंवलजीत सिंह, मानव गोहिल आदि।
लेखक, निर्देशक: रेणुका शहाणे
रेटिंग: ***
रेणुका शहाणे की पहली छवि अब भी हिंदी पट्टी के दर्शकों के मन में वही बसी हुई है जब वह दूरदर्शन पर हर हफ्ते सिद्धार्थ काक के साथ बैठकर ‘सुरभि’ प्रस्तुत किया करती थीं। निर्देशक के तौर पर वह सिनेमा का कौन सा दृष्टिकोण लेकर आएंगी, इसे लेकर उनके काम पर नजर रखने वालों को काफी उत्सुकता रही है। रंगमंच के मशहूर निर्देशक व अभिनेता विजय केंकरे से उनकी शादी चली नहीं। आशुतोष राणा में उनको जीवन का विश्राम मिला। रेणुका की लिखी और निर्देशित फिल्म ‘त्रिभंग’ का बीज हो सकता है वहीं से अंकुरित हुआ हो। वह स्त्री सशक्तीकरण का सिनेमा लेकर आई हैं। संजय लीला भंसाली की नायिका बिमल रॉय की फिल्मों के महिला चरित्रों जैसी ही हिम्मती, मजबूत और साहसी होती आई है। और, कितने निर्देशक हैं जिनके मन में अपनी नायिका के स्वाभिमान की बात भी आती होगी भला! लेकिन, स्त्री का स्वाभिमान अपने मन का करने में तो है, बगावत करने में भी है, लेकिन ये सामने वाले की बेइज्जती से जुड़ा ही हो, जरूरी नहीं है।
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त्रिभंग
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘त्रिभंग’ एक बहस को जन्म देती फिल्म है। एक पुरस्कृत लेखिका अपने जीवन के चौथे सोपान में अपने भीतर का सब कुछ संसार को बता जाना चाहती है। उसे एक युवा इस काम में मदद कर रहा है उसकी यादों को रिकॉर्ड करके और फिर उसे लिपिबद्ध करके। यौवन उसका सास के तानों में बीता। लेकिन, फिर एक दिन उसने यह सब छोड़ लेखन को जीवन माना और पति का घर छोड़ दिया। अतीत और वर्तमान को जोड़ती ये कहानी भविष्य के लिए एक ऐसा कैनवस खड़ा करती है, जिसमें और तमाम लेखकों व निर्देशकों को अपनी समझ बूझ के रंग भरने चाहिए। ये कहानी तीन पीढ़ियों की महिलाओं की है। दूसरी पीढ़ी ने अभिनय और नृत्य को अपना करियर बनाया। यह भी समाज की प्रचलित पंरपरा को तोड़ने की ही बात है। लेकिन, अपनी मां और अपनी नानी से कहीं ज्यादा समझदार और कहीं ज्यादा प्रायोगिक है, तीसरी पीढ़ी।
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त्रिभंग
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रेणुका शहाणे ने फिल्म को लिखने और इसे निर्देशित करने के स्तर पर बहुतेरे प्रयोग किए हैं। एक तो प्रयोग इस फिल्म की भाषा ही है। इसके कई लंबे लंबे दृश्य पूरे के पूरे मराठी में हैं। मुंबई में रहने के अनुभव के चलते मुझे तो ये सब समझ आते हैं, लेकिन हिंदी के दर्शकों के शायद ये पल्ले न पड़ें। दूसरा प्रयोग वह अपनी फिल्म की नायिका के साथ करती हैं। यहां वह अनुराग कश्यप के सिनेमा से प्रेरित दिखती हैं और एक ऐसी नायिका निखारने की कोशिश करती हैं जिसे अपने परिजनो के सामने किसी भी तरह की गाली देने में संकोच नहीं है। ये और बात है कि फिल्म को स्मार्ट टीवी पर देखते समय ऐसे मौको पर आपको घर के बाकी सदस्यों के बारे में सोचना पड़ सकता है। फिल्म के साथ हालांकि डिस्क्लेमर है कि यह फिल्म वयस्कों के लिए ही है, लेकिन वयस्क होने का मतलब गाली वाले संवाद सुनना ही क्यों होना चाहिए? वयस्क सोच का सिनेमा भी तो वयस्कों के लिए हो सकता है।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रेणुका शहाणे की इस फिल्म के निर्माता अजय देवगन हैं। अपनी पत्नी के लिए बन रही फिल्म में ऐसे संवाद और ऐसी कहानी का पोषण करना भी उनके व्यक्तित्व के अनदेखे पहलू को दर्शाता है। काजोल लगातार ऐसी कोशिशें कर रही हैं कि वह हिंदी सिनेमा में महिला चरित्रों को एक अलग स्तर तक लेकर जाएं। इसके पहले ‘हेलीकॉप्टर ईला’ में भी वह इसके लिए सराहना बटोर चुकी हैं। वह शायद ये जताना चाहती हैं कि ‘मर्दानी’ बनने के लिए खाकी पहनना ही जरूरी नहीं। स्त्री को ‘मर्दानी’ अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी बनना चाहिए। अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए। दूसरों का आलंबन त्यागना चाहिए और फिर अपनी मर्जी का जीवन जीना ही चाहिए।
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- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनय के लिहाज से इस फिल्म में काजोल के अलावा मिथिला पालकर ने भी अद्भुत अभिनय किया है। वह फिल्म में ताजगी लेकर आती है। उनके किरदार की लिखावट भी फ्रेश फील होती है। और, तनवी आजमी तो हैं ही फिल्म में सोने पर सुहागा। फिल्म की शुरुआत में ही कुणाल रॉय कपूर के साथ हाथ में व्हिस्की का गिलास लेकर जो माहौल वह बनाती हैं, वह फिल्म को एक अच्छा टेक ऑफ दे जाता है।
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