-निर्माताः कृअर्ज एंटरटेनमेंट
-निर्देशकः प्रोसित रॉय
-सितारेः अनुष्का शर्मा, परमब्रत चटर्जी, रजत कपूर
रेटिंग **
होली में क्या काला आपका फेवरेट रंग है? क्या आप होली के रंगीन मौसम में खिल कर खुले में आने के बजाय अंधेरे कोनों में दुबक जाते हैं? अगर हां तो आप अनुष्का शर्मा की परी को देख सकते हैं। लेकिन आप इन रंग-बिरंगे दिनों का आनंद लेते हैं तो विश्वास कीजिए कि परी के रंग और अंदाज-ए- बयां बहुत ही डार्क हैं।
निर्माता-निर्देशक भले कहें कि यह हॉरर फिल्म है मगर ऐसा नहीं है। परी में वीभत्स रस का सिनेमा है। यहां नायिका में शैतानी आत्मा है और वह कुत्ते से लेकर इंसान तक का खून पीती है! फिल्म पर नीले रंग की परत चढ़ी है जिससे रहस्य कुछ गहरा नजर आए लेकिन मुश्किल यह है कि कहानी में ऐसा कुछ नहीं, जिसके प्रति जिज्ञासा बढ़े या कम से कम जो दिख रहा है, उसके प्रति बनी रहे!
निर्देशक-लेखक कहानी को दूर कौड़ी जैसा ढूंढ कर लाए हैं। माहौल कोलकाता का है और बांग्लादेश में 1970 के दशक में एक विशेष जनजाति की महिलाओं पर शैतान की बेटियां होने के आरोप के साथ उन्हें खत्म करने का आंदोलन चलता है। शैतान का वंश न बढ़े इसलिए एक तांत्रिक/प्रोफेसरनुमा व्यक्ति (रजत कपूर) इन महिलाओं को जंगल और खंडहरों जैसी जगह में जंजीरों में बांध कर रखता है, इनका प्रसव कराता है और पैदा होने वाले बच्चे को मार देता है।
उसके चंगुल से एक महिला भाग निकलती है और बेटी को जन्म देती है। उसने दुनिया से छुपा कर जंगल में बेटी को पाला है, यह है रुखसाना (अनुष्का शर्मा)। मां एक कार एक्सिडेंट में मर जाती है। कार मालिक अर्णब (परमब्रत चटर्जी) की रुखसाना से सहानुभूति हो जाती है। इसके बाद घटनाएं लगातार बे-सिर- पैर के क्रम में बदल जाती हैं। रुखसाना को अर्णब से प्यार हो जाता है, वह गर्भवती हो जाती है, तांत्रिक/प्रोफेसरनुमा व्यक्ति उसका पता लगाकर मारने पहुंच जाता है। सच्चाई जानकर अर्णब दुविधा में है कि क्या करे क्योंकि उसकी शादी एक लड़की से तय हो चुकी है!
यह परी कोई परी कथाओं जैसी कहानी नहीं है लेकिन इसमें बच्चों की कहानी जितना मनोरंजन भी नहीं है। खून-खराबे वाले दृश्यों की इस कहानी में किरदारों का गेट-अप रामसे ब्रदर्स वाला फील देता है। फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत कच्चे ढंग से लिखी गई है। जो इसकी नाकामी की असली वजह है। यहां चाह कर भी आप नहीं डर पाते। अनुष्का में यहां न तो आकर्षण है और न अभिनय। परमब्रत भी औसत लगे। निर्देशक प्रोसित रॉय प्रभावित नहीं करते। फिल्म देखने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आती। हां, आप किसी दोस्त को फिल्म देखने भेज कर ठिठोली कर सकते हैं कि बुरा ना मानो होली है!!