छोटे पर्दे की चर्चित अभिनेत्री शिल्पा सकलानी कभी एकता कपूर के लोकप्रिय धारावाहिक 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में गंगा की भूमिका निभा कर खूब चर्चा में रहीं। करीब तीन दर्जन से अधिक शोज में कई तरह की चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभा चुकी शिल्पा सकलानी का भी तमाम सफल कलाकारों की तरह यही कहना है कि उन्होंने अभिनय को पेशा बनाने के बारे में कभी सोचा नहीं था। वह भी सादा जीवन, उच्च विचार को मानने वाली हैं। लेकिन, किरदार वह बहुत जल्द ही कैकेयी का निभाती नजर आने वाली हैं।
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कैकेयी ने राम और सीता को मुंह दिखाई में कनक भवन दे दिया था, लेकिन वही कैकेयी बाद में रामकथा में खलनायिका बनी नजर आई, आपको क्या पता था इस चरित्र के बारे में?
मैं उन अज्ञानी लोगों में से थी, जिसे इस बात का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था कि कैकेयी क्या थी? जब पहली 'रामायण' आई थी तब बहुत छोटी थी। मुझे कैकेयी के बारे में बहुत कम पता था। कैकेयी के लिए मेरी भी नेगेटिव प्रतिक्रिया थी, जैसे आम तौर पर लोगों का होता है। कैकेयी को लोगो ने इतना निगेटिव किरदार मान लिया है कि आज तक किसी ने अपनी बेटी का नाम कैकेयी नहीं रखा। अब आनंद नीलकंठन की लिखी 'श्रीमद रामायण' से लोगों को यह बताने की कोशिश की जाएगी कि वाकई में कैकेयी कौन थी?
कैकेयी के किरदार के लिए आपको अलग से किस तरह की तैयारी करनी पड़ी ?
मुझे बहुत ही विस्तार ने इस किरदार के बारे में जानना पड़ा। मैंने लेखक टीम से इस किरदार के बारे में बहुत ही विस्तार से बात की। मेरे लिए इस किरदार के बारे में बहुत कुछ जानना इसलिए जरूरी था, क्योंकि मैं कोई काल्पनिक किरदार नहीं करने जा रही थी। यह एक बहुत बड़े लीजेंड का किरदार है। उनके अंदर ऐसा भाव था कि कौशल्या को बड़ी बहन और सुमित्रा को छोटी बहन जैसी प्यार देती थी। राम को लेकर उनका अथाह प्रेम था। राम ने जो कुछ भी सीखा उसका श्रेय वह कैकेयी को ही देते थे। कैकेयी खुद बहुत बड़ी योध्या और राजनीतिज्ञ थीं।
टेलीविजन पर ऐसा कौन सा किरदार है, जो आपके दिल के अभी भी बहुत करीब है?
'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की गंगा का किरदार मेरे दिल के अभी भी बहुत करीब है। इससे पहले मैंने एक शो 'एक टुकड़ा चांद' का किया था। एकता कपूर ने उस शो को देखा था। एकता कपूर ने कहा कि तुम नई जनरेशन की तुलसी की बहू गंगा होगी। उन्होंने मुझे 45 मिनट तक नरेशन दिया। और, बोली कि कल सेट पर आ जाना। अगले दिन जाकर शूटिंग कर ली। उस समय उसी दिन टेलीकास्ट होता था क्योंकि एपिसोड्स का बैंक बन पाना तब मुश्किल होता था। दिन में शूटिंग की और रात को 10.30 पर एपिसोड टेलीकास्ट हो गया। अगले दिन सुबह जब मैं ट्रेन में बैठी तो लोग मुझे घूर -घूर कर देख रहे थे।
ऐसा क्यों?
मेरी समझ में नहीं आया कि हर इंसान मुझे क्यों घूर कर देख देख रहा है। बस में बैठी तो लोग घूर रहे थे। ट्रेन में बैठी तो लोग मुझे घूरते हुए निकल रहे थे। मेरे पिता जी नेवी में थे, मैं नेवी नगर से आती थी। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' का सेट गोरेगांव पश्चिम के कामत क्लब में लगा हुआ था। उस समय मैं बस और ट्रेन से सफर करती थी। जब सेट पर पहुंची तब मुझे पता चला कि कल जो शूट हुआ था, वह रात में टेलीकास्ट ही गया। उस शो की लोकप्रियता बहुत बड़ी थी, लोग खूब उस शो को देखते थे। तब मुझे समझ में आया कि लोग मुझे बस और ट्रेन में क्यों घूरकर देख रहे थे। मैंने भगवान का शुक्रिया किया। मेरी कोशिश रही है कि जिंदगी में गलती से भी कोई गलत काम न हो, शायद ईश्वर ने इसी का मुझे ये फल दिया।