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Amar Ujala Samvad: 'शोहरत नशे जैसी है, नशा उतरेगा तब कतार में लगना पड़ेगा, इसलिए सादगी रखिए', बोले जॉन अब्राहम

Sun, 04 Aug 2024 06:35 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति राघव Updated Sun, 04 Aug 2024 06:35 PM IST
सार

देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आज रविवार को अमर उजाला संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें खेल, राजनीति और सिनेमा की चर्चित हस्तियों ने हिस्सा लिया। बॉलीवुड अभिनेता जॉन अब्राहम भी कार्यक्रम में पहुंचे। इस दौरान उन्होंने अपनी निजी जिंदगी से लेकर अपनी आगामी फिल्म 'वेदा' व सिनेमा से जुड़े मुद्दों पर दिलचस्प बात की।

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Amar Ujala Samvad 2024: Vedaa Movie star John Abraham interview actor talks about action in cinema
जॉन अब्राहम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आज देहरादून में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम हुआ। इसमें कई दिग्गज हस्तियों ने शिरकत की है। मशहूर बॉलीवुड अभिनेता जॉन अब्राहम भी आज रविवार को संवाद में शामिल हुए। इस दौरान अभिनेता ने अपनी जिंदगी और करियर के साथ-साथ सिनेमा के तमाम पहलुओं पर बात की। जॉन अपनी आगामी फिल्म 'वेदा' के बारे में भी बात करते नजर आए। इस फिल्म में वे अभिमन्यु की भूमिका में दिखाई देंगे। साथ ही वे फिल्म के सह-निर्माता भी हैं। संवाद में जॉन ने क्या कहा? आइए जानते हैं...

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'वेदा' फिल्म में आखिर कौन सी महाभारत चल रही है जो आप कह रहे हैं कि जब-जब अधर्म होगा, धर्म की रक्षा के लिए आऊंगा'। 
जॉन अब्राहम: 'मेरे किरदार का नाम अभिमन्यु है। इस बारे में ज्यादा बताना नहीं चाहूंगा। मैं चाहूंगा कि आप फिल्म देखें। यह फिल्म महिला सशक्तीकरण के मुद्दे पर बनी है। मनोरंजन के तरीके से इसे बताना बहुत चुनौतीपूर्ण था, लेकिन निर्देशक निखिल आडवाणी और पटकथा लेखक ने यह काम बखूबी किया'। 

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Amar Ujala Samvad 2024: Vedaa Movie star John Abraham interview actor talks about action in cinema
जॉन अब्राहम - फोटो : अमर उजाला
देश में लोग आजकल अलग-अलग मुद्दों पर काफी मजबूती से अपनी राय रखते हैं। बतौर अभिनेता क्या ऐसे मुद्दों पर फिल्में करना मुश्किल है?
जॉन अब्राहम: हमें इस पर काम करने में तीन-चार साल लगे। हमारे मन में भी सवाल था कि इसे करें या नहीं करें क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा है। मैं और निखिल आडवाणी इस बारे में साफ नजरिया रखते थे कि इस पर फिल्म बननी चाहिए। आप मेरी फिल्में देखेंगे तो बतौर प्रोड्यूसर मेरी पहली फिल्म थी विकी डोनर। मेरी अगली फिल्म मद्रास कैफे थी, फिर परमाणु बनी। सेना की वर्दी पहनना या भारत का प्रतिनिधित्व करना मुझे अच्छा लगता है। बतौर प्रोड्यूसर भारत के बारे में अच्छी चीजें बताना मेरी जिम्मेदारी बनती है। हम हॉलीवुड फिल्में देखकर सोचते हैं कि काश हम नेवी सील्स जैसे दिखें। तो ऐसा लोग भारतीय जवानों के बारे में क्यों नहीं सोच सकते? युवाओं के लिए ऐसे विषयों पर फिल्में जरूरी हैं। जब हम युवाओं को सिर्फ ज्ञान देंगे तो उनकी दिलचस्पी नहीं बनेगी, मनोरंजक तरीके से उन्हें वह बात बताना जरूरी है। इतिहास पढ़ना जरूरी है, हम यह भूलते जा रहे हैं। 
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यहां अभी पदक विजेता एथलीट थे। हर एक की कहानी फिल्म बनाने लायक है, लेकिन जो मुद्दे देश के ताने-बाने को छूते हैं, उस पर तीखी प्रतिक्रिया भी आती है। 
जॉन अब्राहम: बहुत आसान सी बात है। फिल्म अच्छी होगी तो चलेगी। अच्छी नहीं होगी तो कितनी भी मार्केटिंग कर लीजिए, फिल्म नहीं चलेगी। आज मैं यहां अमर उजाला के मंच पर हूं और हम प्रासंगिक बातें कर रहे हैं। मैं गलत भी हो सकता हूं, लेकिन मुझे लगता है कि इसकी तुलना में किसी मॉल में जाकर नाचेंगे तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। जैसे पठान एक मनोरंजक फिल्म थी, तो चल गई। काफी लोग कहते हैं कि इंस्टाग्राम पर रील बनाइए, ये कीजिए, वो कीजिए। मेरा कहना है कि आपका क्राफ्ट ही अच्छा नहीं है, फिल्मांकन सही नहीं है तो रील्स बनाने का फायदा क्या है? वो सब फिर बेकार है। मेरे पास वॉट्सएप नहीं है, मैं सोशल मीडिया इस्तेमाल नहीं करता। मैं जो काम करता हूं, मैं उसी पर ध्यान केंद्रित करता हूं। मेरी जिंदगी में ब्लू टिक और ग्रे टिक नहीं है, इसलिए कोई तनाव नहीं है। मेरी मानिए, आप भी अपनी जिंदगी से उसे निकाल दीजिए। 

आप आज के दौर में बिना वॉट्सएप कैसे रह लेते हैं?
जॉन अब्राहम: मैं बहुत ही मध्यमवर्ग परिवार से आता हूं। मेरे बैंक अकाउंट में 550 रुपये थे, जब मैंने शुरू किया। तब लोगों ने कहा कि नाकाम हुए तो क्या करेंगे। मैंने कहा था कि नाकाम हुआ तो घाटा कितना होगा? सिर्फ 550 रुपये। जिंदगी सादगीभरी होनी चाहिए। कपड़े सादे पहनिए। आपके लिए जितना जरूरी है, उतना ही कीजिए। गाड़ी चाहिए तो गाड़ी खरीदो, लेकिन दूसरों के दबाव में हर दूसरे साल गाड़ी मत खरीदो।

2003 से 2024 तक का दो दशक का सफर कैसा रहा? 
जॉन अब्राहम: मुझे खुद में बहुत सुधार लाना है। मैं अब भी क्लासेस लेता हूं। मुझे यह कहने में कोई दिक्कत नहीं है। आप हर बात स्टाइल में नहीं बोल सकते। लहजा सही होना जरूरी है। बतौर प्रोड्यूसर अच्छी फिल्में बनाना जरूरी है। आपकी विश्वसनीयता आपके साथ होनी चाहिए। कोशिश रहती है कि गलत चीजें न करूं। मेरे लिए एक रुपया आज भी सौ पैसे के बराबर है। मध्यमवर्ग इस बारे में जानता है। मैं पैदाइशी अमीर नहीं हूं। आपको कीमत पता होनी चाहिए। हर इंसान के सम्मान की जरूरत है। आपको उन लोगों के सामने एटिट्यूड दिखाने की जरूरत नहीं है जो लोग आपकी फिल्मों के टिकट खरीदते हैं।

ये सादगी तो तपस्या से आती है। यह सब कैसे हासिल किया?
जॉन अब्राहम: मेरे पिता केरल से हैं। मां पारसी हैं। वो लोग बहुत सादगीभरे हैं। उनके पास एक सामान्य कार है। जब कार नहीं होती तो मां बस में जाती हैं या पिता रिक्शा ले लेते हैं। हमारे क्षेत्र में शोहरत एक नशे की तरह है। मशहूर लोग एयरपोर्ट की कतार में आगे जाने की कोशिश करते हैं, लेकिन मैं कतार में खड़ा रहता हूं। जब ये शोहरत चली जाएगी, तब वैसे भी मुझे उसी कतार में खड़े होना है।

किसी बड़ी उपलब्धि का जिक्र करना चाहेंगे?
जॉन अब्राहम: मैं बड़ा या खूबसूरत नहीं हूं, लेकिन बेबाक जरूर हूं। प्रोड्यूसर बनने का फैसला ऐसा ही बेबाकी भरा था। तब विकी डोनर बनाई। वह अपने वक्त से आगे की फिल्म थी। आयुष्मान और यामी ने उसमें अच्छा काम किया। मैं आदित्य चोपड़ा साहब को अपना गुरु मानता हूं। मेरी प्रयोगात्मक फिल्में विफल भी होती हैं, लेकिन आदित्य चोपड़ा मुझे बताते हैं कि जो फिल्में नहीं चलीं, वह आपके श्रेष्ठ निर्णयों में से एक थी। 

आपकी फिल्म अलग-अलग विषयों पर रही हैं। लीक से हटकर फिल्में चुनने की हिम्मत कहां से आई?
जॉन अब्राहम: मेरी एक फिल्म थी। मैंने नरैशन दिया तो लोगों ने कहा कि इससे घटिया विषय मैंने जिंदगी में नहीं सुना। वह फिल्म परमाणु थी। प्रतिक्रिया जानकर मैं मुस्कराया। हमें खुद जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि फैसला हमारा होगा, तो नाकामी भी हमारी ही होगी। 

 

Amar Ujala Samvad 2024: Vedaa Movie star John Abraham interview actor talks about action in cinema
जॉन अब्राहम - फोटो : अमर उजाला

बीते 20 साल के दौर में आपने कई सितारों के बीच रहकर अपनी जगह बनाई है। कितना मुश्किल है अपनी अलग राह बनाना?
जॉन अब्राहम: मेरे साथी कलाकार बहुत अच्छे हैं। मैं किसी की निंदा नहीं करूंगा। दिक्कत यह है कि मैं सुबह साढ़े नौ बजे सो जाता हूं और सुबह साढ़े चार बजे उठ जाता हूं। मैं शराब नहीं पीता। ...तो मैं पार्टियों में जाकर क्या करूं। सुबह उठकर ही जिम जाता हूं। मेरी जीवनशैली अनुशासित है और लोगों को बोरिंग लगती है। मेरे लोगों से रिश्ते अच्छे हैं। मेरे पास पब्लिसिस्ट नहीं है। 20 साल में सिर्फ छह महीने ही मेरे पास पब्लिसिस्ट रहा और वह भी गलत फैसला रहा। मैं शादियों में नहीं जाना चाहता, पान मसाला का एड नहीं करना चाहता। तो कोई मेरे साथ टिक नहीं पाता था। मेरे साथ 'ना' बहुत हैं।

युवाओं को क्या टिप्स देना चाहेंगे?
जॉन अब्राहम: बहुत उबाऊ सलाह है, लेकिन पहले पढ़ाई करें। पढ़ाई बताती है कि सही क्या है और गलत क्या है। मैंने एमबीए किया है। आपको जिसमें दिलचस्पी है, उसकी पढ़ाई करें। दूसरी बात- शारीरिक फिटनेस से मानसिक फिटनेस ज्यादा जरूरी है। मैं ट्रेलर लॉन्च पर गया तो लोग सवाल पूछने लगे कि आपके डोले इतने बड़े हैं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता। आप कसरत करें, मैं फिटनेस पर पूरे दिन भी बात कर सकता हूं। जंक फूड आप मत खाइए। जो आपको जंक फूड ऑफर रहा है, वह आपका दोस्त नहीं है, यह याद रखें। आपके कैलोरी इनटेक को देखते रहिए। 

क्या आप शाकाहारी हैं?
जॉन अब्राहम: मैं शाकाहारी हूं। मैं वीगन भी रहा। मैं जानवरों से प्यार करता हूं। हमारे यहां जानवरों की देखभाल के लिए कोई कानून नहीं है। मुझे काजू कतली बहुत पसंद है, लेकिन कई वर्षों से मैंने नहीं खाई।

सबसे बुरी आलोचना कोई मिली हो?
जॉन अब्राहम:
आलोचना मेरी आज भी होती है। मुझे अभी और सुधार करना है। मनोज बाजपेयी मेरे पसंदीदा हैं। हर अभिनेता से मैंने कुछ सीखा है। 

क्या कभी उत्तराखंड आए हैं?
जॉन अब्राहम:
परमाणु और बाटला हाउस के लिए हम यहां आए थे। मैं देहरादून को खुशकिस्मत मानता हूं। वेदा सिर्फ एक्शन फिल्म नहीं है, बहुत प्यारी फिल्म है। यहां की सरकार हमारी मदद करे तो हम उत्तराखंड में आकर जरूर फिल्में बनाना चाहेंगे। 

Amar Ujala Samvad 2024: Vedaa Movie star John Abraham interview actor talks about action in cinema
जॉन अब्राहम - फोटो : अमर उजाला

क्या फिल्म सितारों को राजनीतिक होने से डर लगता है?
जॉन अब्राहम: मैं बहुत गैर-राजनीतिक व्यक्ति हूं, लेकिन मैं अपने विचार रखता हूं। मद्रास कैफे और परमाणु इसीलिए बनाई। अगली फिल्म डिप्लोमैट होगी, जो पाकिस्तान में पदस्थ राजनयिक पर आधारित होगी। तेहरान पर भी काम चल रहा है। तेहरान के बाद डिप्लोमैट आएगी।  मैंने बहुत सी खराब फिल्में की हैं, इसलिए अब फिल्मों के चयन को लेकर सतर्क रहता हूं, इसलिए मेरी फिल्में कम आती हैं। मैं किताबें, पॉडकास्ट, लेख कई सारी चीजें पढ़ता हूं। मणिपुर का मुद्दा हो, वायनाड का हादसा हो, वेनेजुएला की हलचल हो, मैं सबके बारे में पढ़ता हूं। ऐसा नहीं करूंगा तो लोग सिर्फ मेरी मांसपेशियों के बारे में ही बात करेंगे। मद्रास कैफे की रिलीज के एक दिन पहले मैं स्टूडियो हेड के साथ बैठा था, उन्होंने कहा कि यह फिल्म तो फेल होने वाली है, इसे एडजस्ट कैसे करेंगे। बाद में उन्हें ही राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

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