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बहादुर बेटीः सपने को उड़ान दी और CWG में रचा दिया वो इतिहास, मां के आंसू छलके

Sun, 22 Apr 2018 04:01 PM IST
संजीव पंगोत्रा/अमर उजाला, चंडीगढ़
संजीव पंगोत्रा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Sun, 22 Apr 2018 04:01 PM IST
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Chandigarh Shooter Anjum Modgil Wins Silver Medal In Commonwealth Games 2018
anjum mudgil
बहादुर बेटी को सलाम, जिसने अपने सपने को ऐसी उड़ान दी कि आसमां छू लिया। CWG में वो इतिहास रचा कि मां के आंसू छलक पड़े।
Chandigarh Shooter Anjum Modgil Wins Silver Medal In Commonwealth Games 2018
अंजुम मौदगिल
बात हो रही है, चंडीगढ़ की 24 वर्षीय शूटर अंजुम मौदगिल की। ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 21वें राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए अंजुम ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया। महिलाओं की 50 मीटर राइफल पोजीशन-3 के फाइनल में अंजुम ने 455.7 अंकों के साथ रजत पदक जीता। तेजस्विनी ने कुल 457.9 अंक हासिल करते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया और स्कॉटलैंड की सियोनेड मिकतोश को 444.6 अंकों के साथ कांस्य पदक मिला।
Chandigarh Shooter Anjum Modgil Wins Silver Medal In Commonwealth Games 2018
अंजुम मौदगिल
अंजुम की खासियत ये है कि वो राइफल शूटिंग के तीन अलग-अलग वर्गों में माहिर हैं जो आसान काम नहीं है- 10 मीटर एयर राइफल, 50 मीटर प्रोन और 50 मीटर 3 पोजिशन। अभी पिछले महीने ही अंजुम ने इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट्स फेडरेशन (आईएसएसएफ) विश्वकप में सटीक निशाना लगाते हुए सिल्वर मेडल झटक लिया। लगभग दस साल के अंतराल के बाद चंडीगढ़ की शूटर की झोली में मेडल आया। इससे पहले 2008 में अभिनव बिंद्रा ने पदक जीता था।
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Chandigarh Shooter Anjum Modgil Wins Silver Medal In Commonwealth Games 2018
अंजुम मौदगिल
विश्वकप में अपने पहल मेडल को अंजुम ने अपनी मां शुभ मौदगिल को समर्पित किया। अंजुम की मां का अपनी बेटी को टॉप रैंकिंग का शूटर बनाने में अहम योगदान रहा है। अंजुम की मां ने ही उनका परिचय शूटिंग से कराया था। अंजुम की मां भी शूटर रह चुकी हैं। उन दिनों जब भी समय मिलता था, वह अपनी बेटी को शूटिंग रेंज साथ लेकर जाती थीं। वहीं से अंजुम को भी शूटिंग में रुचि होने लगी। मां से प्ररेणा लेकर शूटिंग कंपीटीशन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।
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Chandigarh Shooter Anjum Modgil Wins Silver Medal In Commonwealth Games 2018
अंजुम मौदगिल
पिस्टल से शुरु करने के बाद अंजुम को राइफल वर्ग में उतरना पड़ा, क्योंकि पिस्टल उपलब्ध नहीं होती थी। अंजुम ने भी कड़ी मेहनत की। शुरू में निशानेबाजी के लिए उनके पास जरूरी संसाधन नहीं थे। न तो ज़रूरी उपकरण मिल पाते थे, न कोई नियमित कोच और उस पर से समय-समय पर चोटिल होना। 2013 के आस-पास अंजुम के लिए समय पलटा, जब जूनियर टीम में रहते हुए उन्हें एक नियमित कोच का साथ मिलने लगा।

 
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