ऋषि गंगा से आए सैलाब ने तपोवन बैराज और सुरंग में काम कर रहे लोगों को संभलने का मौका दे दिया था। बैराज से करीब 400 मीटर पहले गरम पानी के पास सैलाब का पानी फैल गया था, जिससे इसकी रफ्तार कम हो गई थी। यदि परियोजना की सुरंग के बाहर स्थापित सायरन सक्रिय हो जाता तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं।
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चमोली में आपदा
- फोटो : अमर उजाला
सात फरवरी को ऋषि गंगा से आया सैलाब लोगों को तिनके की तरह बहाकर ले गया। नदी के दोनों तटबंध से कई मीटर ऊपर मलबा और पानी गया। रैणी से तपोवन तक नदी एक संकरी घाटी में बहती है, जिससे यहां पानी की रफ्तार अधिक रही, लेकिन तपोवन गरम पानी के पास सैलाब कुछ देर के लिए सामान्य हो गया था। यहां पर करछों गांव की ओर से आने वाले गदेरे के कारण नदी फैल जाती है।
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चमोली में तपोवन डेम
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद फिर नदी का ढलान शुरू हो जाता है, जिससे पानी तीव्र गति से बहता है। तपोवन गांव के कुशलानंद ने बताया कि हमने देखा कि गरम पानी के पास सैलाब में बहकर आ रहा मलबा और पानी फैल गया था। कुछ देर तक मलबा और पानी ने यहां अपनी जगह बनाई। इससे करीब 400 मीटर की दूरी पर तपोवन परियोजना का बैराज और सुरंग है।
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नदी में मलबा
- फोटो : अमर उजाला
सुरंग के बाहर दो सायरन सिस्टम हैं, एक छोटा और एक बड़ा। यदि समय पर सायरन बज जाता तो कई जिंदगियों को बचाया जा सकता था। जब सैलाब परियोजना तक पहुंच गया, तो उसके बाद का मंजर बेहद विकराल और डरावना था। तपोवन में धौली गंगा के ठीक दूसरे छोर पर भंग्यूल गांव स्थित है। इस गांव की दो छात्राएं मोनिका और मनीषा सात फरवरी को सैलाब आने के करीब दस मिनट पहले नदी पर लगे झूला पुल को पार कर तपोवन की ओर आ रही थीं।
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चमोली में आपदा के बाद का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
दोनों छात्राओं ने बताया कि वे तपोवन बाजार जा रही थीं। उस समय नदी किनारे और उसके नजदीक लोग मौजूद थे। कुछ महिलाएं घास निकाल रही थीं, जैसे ही सैलाब आया तो सबको बहाकर ले गया। यह देख हमारी आंखें बंद हो गई थीं। हम सुध-बुध खो चुकी थी। हम मुख्य मार्ग पर जाने के बजाय पहाड़ी रास्ते से होकर तपोवन पहुंचे। ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा था।