विश्व हाथी दिवस पर विशेष: जब काबिनी के जंगलों में क्रोधित हाथियों के झुंड से हुआ सामना
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12 अगस्त का दिन हर साल पूरी दुनिया में वर्ल्ड ऐलीफैंट डे यानी विश्व हाथी दिवस के रूप में मनाया जाता है। तेजी से घटते जंगलों और जंगलों के बीच जाकर इंसानों के रिसॉर्ट्स व बंगले बना लेने के चलते जानवर और इंसान के रिश्ते पहले जैसे मधुर नहीं रहे। इंसान जंगलों तक पहुंच गया है तो जानवर अब इंसानों की बस्तियों में दिखने लगे हैं।
रोमांच, भय और भाग्य भरी उस सुबह की घटना आज भी मेरे रोंगटे खड़े कर देती है, जब कर्नाटक के काबिनी-नागरहोल के जंगल में मेरा सामना हाथियों के एक झुंड से हुआ। अपने डेढ़ दशक के वन्यजीव अनुभवों में मेरे साथ ऐसा कभी नहीं हुआ जब सांस बीच में ही अटक गई हो और शरीर सुन्न हो गया हो जबकि भारत देश में विभिन्न बाघ, तेंदुआ, घड़ियाल अभयारण्यों के भ्रमणों के ऐसे अनेक रोमांचकारी संस्मरण हैं।
बात अक्तूबर 2015 की है, मैं अपने परिवार के साथ काबिनी में सफारी पर था, उस दिन पर्यटकों की संख्या बहुत कम थी और उस गाड़ी में मेरे परिवार के अलावा 3-4 लोग ही और थे। बेमौसम बूंदा-बांदी के कारण पूरे जंगल में एक बेरौनक सन्नाटा फैला था और घंटों की निष्फल भागदौड़ के बाद हमारे चालक ने गाड़ी एक जगह रोक दी और हम सब किसी अलार्म कॉल को सुनने के लिए बैठ रहे।
करीब 15-20 मिनट में बंदरों के शोर ने हमारा ध्यान बंटाया और कुछ की पलों में एक बलिष्ठ तेंदुआ हमारे सामने था। इसके पहले की हम सब लोग तैयार हो पाते, तेंदुआ लपकर एक पेड़ पर चढ़ कर बैठ गया। अब तक सूरज की ताजी किरणें छन कर आने लगी थीं जो फोटोग्राफी के लिए एक बेहतरीन मौका था।
मैंने देखा कि बाईं तरफ से एक और हाथी दौड़ता हुआ हमारी तरफ आया और गाड़ी में जोर से धक्का दिया...
अचानक ड्राइवर ने चिल्लाते हुए हम सबको आगाह किया की आस-पास हाथियों के आने की आवाज आ रही है और उसे गाड़ी को हटाना है, हमारे साथ एक नए- नवेले फोटोग्राफर महोदय थे और दुर्भाग्य से वह तेंदुए की मनपसंद’ तस्वीर नहीं ले पाए थे, उनकी जिद के कारण गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई और तब तक हम लगभग 20-15 हाथियों के झुंड से घिर चुके थे।
हाथियों के इस झुंड में दो छोटे बच्चे थे और पूरा झुंड कमल के फूल जैसी संरचना में बच्चों को छुपाकर आगे बढ़ रहा था। ड्राइवर ने जैसे ही गाड़ी रिवर्स करने की कोशिश की, वो जोर की आवाज के साथ एक पेड़ से जा टकराई। आगे पीछे करने की कोशिश में गाड़ी कीचड़ में फंसी ही थी कि एक तेज झटके से पूरी गाड़ी हिल गई, ये एक बुल था और निश्चित ही हमारी गाड़ी के शोर ने उसे भड़का दिया था।
मैंने देखा कि बाईं तरफ से एक और हाथी दौड़ता हुआ हमारी तरफ आया और गाड़ी में जोर से धक्का दिया, हम सब चीख रहे थे और हमारी स्थिति सैंडविच जैसी थी, पीछे पेड़, दोनों तरफ हाथी और सामने पूरा झुंड, ये तो हमारे ड्राइवर का बुद्धिकौशल था कि उन्होंने मौक़ा और जगह देखते हुए गाड़ी को निकाला और दूर ले आए, हम सब सुरक्षित थे लेकिन सबके चेहरों पर सफेदी थी और ये घटना आज भी जहन में आती है तो रोंगटे खड़े कर देती है।
लेखक ब्रजेश सिंह, वन्यजीव फोटोग्राफर हैैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।