हिमालय की नदियां, सिंधु और ब्रह्मपुत्र दक्षिण एशिया की जीवनरेखा हैं, जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन की अर्थव्यवस्थाओं और आजीविका को संचालित करती हैं। लेकिन 2025 में ये नदियां भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र बन गई हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 का सिंधु जल समझौता पहले से ही विवादों में था, जब अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले (26 लोगों की मृत्यु) के बाद भारत ने इसे निलंबित कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि सिंधु का पानी अब पाकिस्तान के बजाय राजस्थान तक नहरों से ले जाया जाएगा।
इसी बीच, चीन ने ब्रह्मपुत्र पर तिब्बत के मेदोग क्षेत्र में 137 अरब डॉलर की लागत से दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण शुरू कर दिया. उसका दावा है कि वह सिंधु और ब्रह्मपुत्र दोनों का ऊपरी तट नियंत्रक है। ब्रह्मपुत्र पर भारत और चीन के बीच कोई औपचारिक समझौता नहीं है, जिससे चीन को मनमानी करने का मौका मिल गया है। यह दोहरा जल विवाद भारत के लिए भू-राजनीतिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामरिक चुनौतियां लाया है।
सिंधु और ब्रह्मपुत्र: दोहरा जल विवाद
सिंधु नदी प्रणाली, जो 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली है। यह भारत (39%), पाकिस्तान (47%), चीन (8%) और अफगानिस्तान (6%) से होकर गुजरती है। यह लगभग 30 करोड़ लोगों की आजीविका का आधार है। 1960 के सिंधु जल समझौते ने छह नदियों को बांटा: रावी, व्यास और सतलुज (पूर्वी नदियाँ) भारत को, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब (पश्चिमी नदियां) पाकिस्तान को दी गईं।
इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली के 80% पानी का उपयोग पाकिस्तान करता है, जबकि भारत को 20% मिलता है। भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित कृषि उपयोग और 'रन-ऑफ-द-रिवर' जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति है, लेकिन भंडारण की नहीं।
2025 में भारत ने पहलगाम हमले के बाद समझौते को निलंबित कर दिया, यह तर्क देते हुए कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करता है। भारत ने बगलिहार (चिनाब) और किशनगंगा (झेलम) बांधों के जरिए पानी के प्रवाह को नियंत्रित करना शुरू किया, जिससे पाकिस्तान में गंभीर जल संकट की आशंका है, क्योंकि उसकी 80% कृषि (16 मिलियन हेक्टेयर) और 30% जलविद्युत सिंधु पर निर्भर है।
दूसरी ओर, ब्रह्मपुत्र नदी, जो तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के रूप में शुरू होती है, भारत (अरुणाचल प्रदेश, असम) और बांग्लादेश (जमुना) में बहती है। यह भारत के 30% ताजे पानी और 44% जलविद्युत क्षमता का स्रोत है। चीन ने मेदोग में 60 गीगावाट की बांध परियोजना शुरू की है , जिसकी लागत 137 अरब डॉलर है। भारत और बांग्लादेश को डर है कि यह बांध जल प्रवाह को कम करेगा, तलछट को रोकेगा और बाढ़ का खतरा बढ़ाएगा।
विशेष रूप से, भारत और चीन के बीच ब्रह्मपुत्र पर कोई औपचारिक जल समझौता नहीं है, केवल 2002 का एक समझौता ज्ञापन (MoU) है, जो बाढ़ के मौसम में डेटा साझाकरण तक सीमित है। 2017 के डोकलाम विवाद और 2020 में सतलुज डेटा साझाकरण रोकने के बाद, चीन ने 2022 से ब्रह्मपुत्र का डेटा देना भी बंद कर दिया, जिससे भारत में बाढ़ पूर्वानुमान प्रभावित हुआ।
चीन का दावा कि वह दोनों नदियों का ऊपरी तट नियंत्रक है, भारत के लिए चुनौती है। हालांकि, ब्रह्मपुत्र में 86% पानी अरुणाचल और असम में लोहित, दिबांग और सियांग जैसी सहायक नदियों और भारी मानसून से आता है, जबकि तिब्बत से केवल 14%। फिर भी, चीन की मनमानी, जैसे पानी छोड़ने का समय बदलना, असम में बाढ़ को और खराब कर सकती है।
भू-राजनीति और सामरिक जोखिम
सिंधु जल समझौते का निलंबन भारत-पाकिस्तान संबंधों को और तनावपूर्ण बनाता है। पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने कहा, "सिंधु में या तो हमारा पानी बहेगा, या उनका खून।" एक्स पर कुछ पोस्ट्स में दावा किया गया कि पाकिस्तान सैन्य जवाब दे सकता है।
विश्व बैंक, जिसने समझौते की मध्यस्थता की थी, को पाकिस्तान अपील कर सकता है, लेकिन भारत का तर्क है कि आतंकवाद के खिलाफ यह कदम अस्थायी है।
चीन की ब्रह्मपुत्र परियोजना और उसका दावा कि वह सिंधु का भी ऊपरी तट नियंत्रक है, भारत को दोहरे मोर्चे पर चुनौती देता है। चीन और पाकिस्तान का गठजोड़, विशेष रूप से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में, भारत के लिए सामरिक जोखिम बढ़ाता है।
एक्स पर कुछ उपयोगकर्ताओं ने दावा किया कि चीन भारत के खिलाफ ब्रह्मपुत्र का पानी रोक सकता है, लेकिन विशेषज्ञ इसे तकनीकी रूप से जटिल मानते हैं। बीजिंग स्थित एक थिंक टैंक के उपाध्यक्ष विक्टर गाओ ने पानी रोकने के संकेत दिए, जिसे भारत ने क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रयास माना।
पर्यावरणीय और आर्थिक प्रभाव
हिमालयी नदियां जलवायु परिवर्तन के दबाव में हैं। हिमनदों का पिघलना और अनियमित मानसून सिंधु और ब्रह्मपुत्र के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं। सिंधु में भारत के डेटा साझाकरण को रोकने से पाकिस्तान में बाढ़ और सूखे की चेतावनियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
ब्रह्मपुत्र पर चीन के बांध से तलछट की कमी और भूकंप संभावित क्षेत्र में टूटने का जोखिम असम और बांग्लादेश की जैव विविधता को खतरे में डाल सकता है। उदाहरण के लिए, असम में 2018 की बाढ़ ने 45 लाख लोगों को प्रभावित किया, और चीन के बांध इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
आर्थिक रूप से, भारत की शाहपुरकांडी और सियांग बांध परियोजनाएँ ऊर्जा और सिंचाई को बढ़ावा दे सकती हैं। राजस्थान में नहरें बनाने से 3.4 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिल सकती है, जिससे कृषि उत्पादन में 15% वृद्धि की संभावना है। लेकिन इन परियोजनाओं की लागत (शाहपुरकांडी के लिए 900 करोड़ रुपये) और स्थानीय विस्थापन चिंता का विषय हैं।
पाकिस्तान में सिंधु के पानी की कमी से कृषि उत्पादन में 20% तक की कमी हो सकती है, जिससे उसकी जीडीपी को 5% तक नुकसान हो सकता है। बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में कमी से मत्स्य पालन (जीडीपी का 4%) और नौवहन प्रभावित हो सकता है।
भविष्य के प्रभाव
सिंधु जल समझौते का निलंबन और ब्रह्मपुत्र पर चीन की मनमानी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती हैं। यदि भारत सिंधु का पानी पूरी तरह राजस्थान की ओर मोड़ता है, तो पाकिस्तान में 2030 तक 10 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो सकती है, जिससे खाद्य असुरक्षा और सामाजिक अशांति बढ़ेगी। यह भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव को भड़का सकता है, विशेष रूप से क्योंकि दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं।
ब्रह्मपुत्र पर चीन के बांध 2035 तक भारत और बांग्लादेश में जल प्रवाह को 20-30% कम कर सकते हैं, जिससे असम में बाढ़ और सूखे की घटनाएं 25% बढ़ सकती हैं। यह क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को अस्थिर कर सकता है और भारत को जवाबी बांध परियोजनाओं (जैसे सियांग बांध, लागत 50,000 करोड़ रुपये) के लिए मजबूर कर सकता है, जो पर्यावरणीय और सामाजिक लागत बढ़ाएँगी।
चीन की डेटा साझाकरण में पारदर्शिता की कमी भारत की बाढ़ पूर्वानुमान क्षमता को कमजोर करती है। यदि चीन पानी छोड़ने का समय बदलता है, तो असम में वार्षिक बाढ़ से होने वाला नुकसान (वर्तमान में 2000 करोड़ रुपये) दोगुना हो सकता है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन से हिमनदों का 40% पिघलना 2050 तक दोनों नदियों के प्रवाह को 15-20% कम कर सकता है, जिससे सभी देशों में जल संकट गहराएगा।
हिमालयी जल कूटनीति: भारत की राह
इस दोहरे विवाद में भारत के पास क्षेत्रीय नेतृत्व का अवसर है। बांग्लादेश, नेपाल और भूटान के साथ एक क्षेत्रीय जल गठजोड़ बनाकर भारत चीन की ऊपरी तट नीतियों का जवाब दे सकता है।
उदाहरण के लिए, भारत और बांग्लादेश संयुक्त रूप से ब्रह्मपुत्र पर बाढ़ प्रबंधन और जलविद्युत परियोजनाएँ शुरू कर सकते हैं, जैसे तीस्ता नदी पर सहयोग। भारत को संयुक्त राष्ट्र में 1997 के जल संसाधन सम्मेलन को बढ़ावा देना चाहिए, जिसे चीन ने स्वीकार नहीं किया।
आंतरिक रूप से, भारत को वर्षा जल संचयन, चेक डैम, और स्मार्ट जल प्रबंधन को बढ़ावा देना चाहिए। नदी जोड़ परियोजना, जिसकी लागत 5.6 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है, जल सुरक्षा को मजबूत कर सकती है। भारत को विज्ञान-आधारित रणनीतियाँ, जैसे बाढ़ पूर्वानुमान सिस्टम और मजबूत तटबंध, विकसित करनी चाहिए।
सिंधु और ब्रह्मपुत्र जल विवाद भारत के लिए जटिल चुनौतियां हैं। सिंधु जल समझौते का निलंबन और ब्रह्मपुत्र पर औपचारिक समझौते की अनुपस्थिति ने भारत को दोहरे मोर्चे पर जोखिम में डाला है। लेकिन हिमालयी जल कूटनीति के जरिए भारत इन चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है।
क्षेत्रीय सहयोग, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और मजबूत नीतियों के साथ भारत अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है और दक्षिण एशिया में शांति व स्थिरता का नेतृत्व कर सकता है। इस संकट का समाधान केवल भारत की कूटनीतिक चतुराई और क्षेत्रीय एकता पर निर्भर करता है।
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