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एक ऐसा शहर, जहां बोलना है मना
अमर उजाला डेस्क
Updated Mon, 11 Dec 2017 10:44 AM IST
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चंद मिनट के लिए चुप रहना कितना मुश्किल है। जरा सोचिए, आपको पूरा दिन चुप रहना हो तो? पूरा दिन किसी से बात करने को न दिया जाए, कहीं घूमने न दिया जाए? कितना मुश्किल होगा यह सब करना, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं,जो हर साल अपने लिए एक दिन निकालते हैं शांति का। उनके यहां यह मजबूरी नहीं होती, बल्कि परंपरा होती है, और पूरा शहर इस परंपरा में शामिल होता है।
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इंडोनेशिया के खूबसूरत शहर बाली में एक प्रथा है, जिसे 'न्येपी' कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में 'डे ऑफ साइलेंस' भी कहते हैं और यह बालीनीज कैलेन्डर के मुताबिक, हर 'इसाकावरसा' (साका का नया साल) को मनाया जाता है। यह एक हिंदू त्योहार है, जिसे बाली में मनाया जाता है। इस दिन राष्ट्रीय छुट्टी रहती है। बाली के लोग इस दिन शांति से बैठकर बस ध्यान लगाते हैं। न्येपी के दिन कोई भी किसी से बात नहीं करता। इमरजेंसी सेवाओं के अलावा बाजार और परिवहन सेवाएं बंद रहती है।
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कुछ लोग पूरे दिन व्रत भी रखते हैं। पूरा दिन बीत जाने के बाद, अगले दिन बाली के युवा 'ओमेद-ओमेदन' या 'द किसिंग रिचुअल' की रसम में भागीदार बनते हैं, जिसमें वह एक-दूसरे के माथे को चूम कर नए साल की शुभकामनाएं देते हैं। इसी दिन भारत में 'उगादी' मनाया जाता है। न्येपी का यह एक दिन आत्म-प्रतिबिंब के लिए आरक्षित है।
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इस दिन मुख्य प्रतिबंध आग जलाने पर होता है। घरों में भी एकदम मध्यम उजाला किया जाता है। कोई काम नहीं होता। मनोरंजन के साधनों पर प्रतिबंध होता है। कोई भी कहीं यात्रा नहीं करता, बात करना भी प्रतिबंधित होता है। इस दिन सड़कों पर भी कोई आवाजाही नहीं होती। घरों के बाहर चहलकदमी करने वाले सिर्फ सिक्योरिटी गार्ड्स ही रहते हैं, जिन्हें 'पिकालैंग' कहते हैं। प्रतिबंधों का पालन सही ढंग से किया जा रहा है या नहीं ये लोग यह सुनिश्चित करते हैं।
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यह परंपरा बाली में रहने वाले हिंदूओं द्वारा ही निभाई जाती है। इसके अलावा वहां रहने वाले अन्य धर्म के लोगों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होते। उन्हें अपने कामों को करने की आजादी होती है। न्येपी के बाद अगले दिन वहां के लोग एक बार फिर अपनी पुरानी दिनचर्या को शुरू करते हैं। एक-दूसरे के गले लगकर और अन्य कार्यक्रमों और समारोह में भाग लेते हैं।
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