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'यारसागुम्बा'- एक फफूंद जो सोने से भी महंगा है, पूरी दुनिया में इसकी जबरदस्त डिमांड
आमिर पीरज़ादा और नेहा शर्मा की रिपोर्ट/ बीबीसी हिंदी
Updated Mon, 23 Jul 2018 12:19 PM IST
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Yarsagumba
तिब्बती भाषा में यारसागुम्बा का मतलब है 'गर्मियों की घास, सर्दियों का कीड़ा' यानी एक तरह से ये कैटरपिलर और फफूंदी का मिलन है। एक परजीवी फफूंद कैटरपिलर पर हमला करता है और मिट्टी के नीचे उसकी ममी बना देता है। बाद में मरे हुए कैटरपिलर के सिर से एक फफूंदी उगती है। इसी से 'यारसागुम्बा' बनता है।
Yarsagumba
यारसागुम्बा सिर्फ हिमालय और तिब्बती पठार पर 3000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर मिलता है। ये चिकित्सीय इस्तेमाल वाला दुनिया का सबसे महंगा फफूंद है और कई लोगों का मानना है कि इससे अस्थमा, कैंसर और खासतौर पर मर्दाना कमजोरी ठीक हो जाती है। इसी वजह से इसे 'हिमालय का वायग्रा' भी कहा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक किलो यारसागुम्बा की कीमत एक लाख डॉलर तक हो सकती है। हर साल मई से जून के महीनों में हजारों नेपाली पहाड़ों की ओर पलायन करते हैं। गांव खाली हो जाते हैं और स्कूल बंद रहते हैं। सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है और कोई दिखाई नहीं देता।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक किलो यारसागुम्बा की कीमत एक लाख डॉलर तक हो सकती है। हर साल मई से जून के महीनों में हजारों नेपाली पहाड़ों की ओर पलायन करते हैं। गांव खाली हो जाते हैं और स्कूल बंद रहते हैं। सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है और कोई दिखाई नहीं देता।
Yarsagumba
यारसागुम्बा की तलाश में हम सुबह-सुबह चढ़ाई करके 4500 मीटर ऊंचाई पर पहुंचते हैं और पूरा दिन वहीं रहते हैं। कई बार बारिश होती है तो कई बार बर्फ पड़ती है। ये लोग तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर कैंप करके रहते हैं। पांच साल से यारसागुम्बा का व्यापार कर रहे कर्मा लांबा कहते हैं, "दूर दराज से गोरखा, धाधिंग, लामजुंग जिले से लोग यहां यारसागुम्बा की तलाश में आते हैं।"
यारसागुम्बा की तलाश में आए लोग दो महीनों तक बेहद सीमित संसाधनों के साथ टेंटों में रहते हैं। एक युवा जोड़ा यहां तीन साल से आ रहा है। वो बताते हैं, "पहले साल हमें एक भी यारसागुम्बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीख लिया और अब हम आसानी से रोजाना 10-20 यारसागुम्बा तलाश लेते हैं।"
यारसागुम्बा की तलाश में आए लोग दो महीनों तक बेहद सीमित संसाधनों के साथ टेंटों में रहते हैं। एक युवा जोड़ा यहां तीन साल से आ रहा है। वो बताते हैं, "पहले साल हमें एक भी यारसागुम्बा नहीं मिला था। फिर हमने उसकी डंठल को पहचानना सीख लिया और अब हम आसानी से रोजाना 10-20 यारसागुम्बा तलाश लेते हैं।"
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Searching Yarsagumba
खाना बनाने के लिए जलाई गई आग पर हाथ तापते हुए सुशीला कहती हैं, "हम यारसागुम्बा की तलाश में सुबह-सुबह 4500 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचते हैं और पूरा दिन वहीं बिताते हैं। कई बार बारिश होती है और कई बार बर्फ पड़ जाती है। ऊंचाई पर हिमस्खलन का खतरा भी रहता है।"
सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। ये उनकी सालाना कमाई के आधे के बराबर है।
सुशीला और उनके पति की मई और जून के महीने में हर दिन यही दिनचर्या रहती है। यारसामगुम्बा के बदले जो पैसा उन्हें मिलता है उससे वो आसानी से आधा साल काट लेते हैं। पिछले साल उन्होंने दो हजार डॉलर कमाए थे। ये उनकी सालाना कमाई के आधे के बराबर है।
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Searching Yarsagumba
यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट
नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग कहती हैं, "पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी, लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा मांग और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं, "जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।"
यारसागुम्बा तलाशने वालों से बीबीसी टीम की मुलाकात
हमने अपने गाइड पसांग शेरपा और दो कुलियों के साथ काठमांडू से यात्रा शुरू की। हमें अपने पहले पड़ाव तक पहुंचने में दिन भर की यात्रा करनी पड़ी। ये जगत नाम का एक सुंदर पहाड़ी गांव था। हमारा अगला पड़ाव पिसांग था जो 3200 मीटर की ऊंचाई पर है। हमें यहां पहुंचने में पूरा दिन लगा। ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हमारे सामने तेज हवाएं और ऊंचे-नीचे उतार-चढ़ाव थे। रास्ते में कई जगह हमसे वर्क परमिट दिखाने के लिए कहा गया।
नेपाल के मनांग क्षेत्र में 15 सालों से यारसागुम्बा तलाश रही सीता गुरुंग कहती हैं, "पहले मैं हर दिन सौ यारसागुम्बा तक तलाश लेती थी, लेकिन अब दिन भर में मुश्किल से दस-बीस ही मिल पाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा मांग और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से यारसागुम्बा की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। सीता कहती हैं, "जब मुझे रोजाना सौ यारसागुम्बा मिलते थे तब कीमतें बहुत कम थीं। अब जब कीमतें बढ़ गई हैं तो बहुत कम यारसागुम्बा मिलते हैं।"
यारसागुम्बा तलाशने वालों से बीबीसी टीम की मुलाकात
हमने अपने गाइड पसांग शेरपा और दो कुलियों के साथ काठमांडू से यात्रा शुरू की। हमें अपने पहले पड़ाव तक पहुंचने में दिन भर की यात्रा करनी पड़ी। ये जगत नाम का एक सुंदर पहाड़ी गांव था। हमारा अगला पड़ाव पिसांग था जो 3200 मीटर की ऊंचाई पर है। हमें यहां पहुंचने में पूरा दिन लगा। ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हमारे सामने तेज हवाएं और ऊंचे-नीचे उतार-चढ़ाव थे। रास्ते में कई जगह हमसे वर्क परमिट दिखाने के लिए कहा गया।