{"_id":"5b10c1e64f1c1bfa6e8b5905","slug":"the-country-where-prisoners-have-the-most-freedom","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"ऐसे देश जहां कैदियों के पास होती है सबसे ज्यादा आजादी, खासियत इतनी कि गिनते रह जाओगे ","category":{"title":"Weird Stories","title_hn":"अजब गजब","slug":"weird-stories"}}
ऐसे देश जहां कैदियों के पास होती है सबसे ज्यादा आजादी, खासियत इतनी कि गिनते रह जाओगे
बीबीसी हिंदी
Updated Sat, 02 Jun 2018 10:30 AM IST
विज्ञापन
Jail of Norway
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिछले साल दिसंबर में थाईलैंड में पुदित कित्तित्रादिलोक नाम के एक शख्स को 13 हजार 275 साल कैद की सजा सुनाई गई थी। पुदित का जुर्म ये था कि उसने चिटफंड कंपनी के जरिए 2400 लोगों को करोड़ों का धोखा दिया था। उन्हें भरोसा दिया था कि उन्हें अच्छा रिटर्न मिलेगा। पुदित को इस धोखाधड़ी की जो सजा सुनाई गई, वो तो उसकी उम्र क्या, धरती के नियोलिथिक युग से भी लंबी है, लेकिन, थाईलैंड के कानून के मुताबिक वो सिर्फ 20 साल जेल में रहेगा।
handcuff
कैद का मकसद
जब जज किसी को सजा सुनाते हैं तो चार बातों की भूमिका अहम होती है। पहली, किसी को उसके किए की सजा देनी है। दूसरा, उसके बर्ताव को सुधारना है।
तीसरा, उसकी सुरक्षा है क्योंकि जिन लोगों के खिलाफ उसने जुर्म किए हैं, वो उससे बदला लेने के लिए नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। चौथी बात बाकी समाज को संदेश देना है कि ऐसे अपराध करने पर सख्त सजा होगी।
बहुत से लोग, खास तौर से अमरीका में सरकारी वकील ये मानते हैं कि लंबी कैद से ये चारों मकसद पूरे होते हैं। अमरीका के एटॉर्नी जनरल जेफ सेशन्स हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए सख्त सजा की वकालत करते आए हैं। सेशन्स जैसे लोगों का मानना है कि इससे समाज सुरक्षित होगा। लंबी सजा की वकालत करने वाले कहते हैं कि इससे कैदी को अपने जुर्म पर विचार करने और खुद को सुधारने का ज्यादा मौका मिलता है। वो कैद में रहने के नुकसान का तजुर्बा करते हैं। तो वो फिर से कोई जुर्म करके जेल जाने से बचते हैं।
लेकिन, लंबी सजा के प्रावधान से जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ जाती है। इसका सरकारी खजाने यानी आम जनता पर भारी असर पड़ता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल की 2016 में आई रिपोर्ट कहती है अगर अमरीका अपनी जेलों में कैदियों की तादाद 40 फीसदी तक घटा ले, तो वो दस सालों में 200 अरब डॉलर की बचत कर सकता है।
जब जज किसी को सजा सुनाते हैं तो चार बातों की भूमिका अहम होती है। पहली, किसी को उसके किए की सजा देनी है। दूसरा, उसके बर्ताव को सुधारना है।
तीसरा, उसकी सुरक्षा है क्योंकि जिन लोगों के खिलाफ उसने जुर्म किए हैं, वो उससे बदला लेने के लिए नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। चौथी बात बाकी समाज को संदेश देना है कि ऐसे अपराध करने पर सख्त सजा होगी।
बहुत से लोग, खास तौर से अमरीका में सरकारी वकील ये मानते हैं कि लंबी कैद से ये चारों मकसद पूरे होते हैं। अमरीका के एटॉर्नी जनरल जेफ सेशन्स हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए सख्त सजा की वकालत करते आए हैं। सेशन्स जैसे लोगों का मानना है कि इससे समाज सुरक्षित होगा। लंबी सजा की वकालत करने वाले कहते हैं कि इससे कैदी को अपने जुर्म पर विचार करने और खुद को सुधारने का ज्यादा मौका मिलता है। वो कैद में रहने के नुकसान का तजुर्बा करते हैं। तो वो फिर से कोई जुर्म करके जेल जाने से बचते हैं।
लेकिन, लंबी सजा के प्रावधान से जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ जाती है। इसका सरकारी खजाने यानी आम जनता पर भारी असर पड़ता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल की 2016 में आई रिपोर्ट कहती है अगर अमरीका अपनी जेलों में कैदियों की तादाद 40 फीसदी तक घटा ले, तो वो दस सालों में 200 अरब डॉलर की बचत कर सकता है।
American jail
67 फीसदी लोग फिर से पकड़े गए
रिसर्च बताते हैं कि कैद की लंबी मियाद असरदार नहीं होती। फिर 13 हजार 275 साल की सजा सुनाने का कोई तुक है क्या? और सजायाफ्ता लोगों को ये लगता है कि वो पकड़े नहीं जाएंगे। अपराधी भविष्य जेल में बिताने को लेकर डरते भी नहीं। यानी लंबी सजा के बावजूद जेल से छूटते ही लोग जुर्म की दुनिया में लौट जाते हैं।
2009 में अमरीका में हुई स्टडी बताती है कि 3 साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए 67 फीसदी लोगों को नए जुर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमें से 46.9 फीसदी को नए जुर्म के लिए सजा हो गई। जेल भेज दिया गया। ब्रिटेन में जेल से छूटने वाले 70 फीसदी अपराधियों को साल भर के भीतर दोबारा सजा सुनाई गई। जानकार कहते हैं कि पकड़े जाने के बाद भी अपराधियों को यही लगता है कि वो जुर्म करने पर पकड़े नहीं जाएंगे। ऐसे में उन्हें लंबे वक्त तक कैद में रहने का डर नहीं होता।
तो, हम इस बात पर तो राज़ी हो सकते हैं कि अपराधियों को सबक सिखाना जरूरी है। मगर उन्हें कितने दिनों तक कैद में रखा जाए, इस सवाल पर मतभेद हैं। एक जुर्म के लिए अलग-अलग देशों में सजा भी अलग-अलग होती है। जैसे कि 2006 में डकैती करने वालों को फिनलैंड में 16 महीने कैद की सजा मिली। वहीं ऑस्ट्रेलिया में इसी जुर्म की सजा 72 महीने की कैद थी। इंग्लैंड में डकैती की सजा 15 महीने कैद है, तो अमरीका में इस जुर्म की सजा 60 महीने की जेल।
रिसर्च बताते हैं कि कैद की लंबी मियाद असरदार नहीं होती। फिर 13 हजार 275 साल की सजा सुनाने का कोई तुक है क्या? और सजायाफ्ता लोगों को ये लगता है कि वो पकड़े नहीं जाएंगे। अपराधी भविष्य जेल में बिताने को लेकर डरते भी नहीं। यानी लंबी सजा के बावजूद जेल से छूटते ही लोग जुर्म की दुनिया में लौट जाते हैं।
2009 में अमरीका में हुई स्टडी बताती है कि 3 साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए 67 फीसदी लोगों को नए जुर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमें से 46.9 फीसदी को नए जुर्म के लिए सजा हो गई। जेल भेज दिया गया। ब्रिटेन में जेल से छूटने वाले 70 फीसदी अपराधियों को साल भर के भीतर दोबारा सजा सुनाई गई। जानकार कहते हैं कि पकड़े जाने के बाद भी अपराधियों को यही लगता है कि वो जुर्म करने पर पकड़े नहीं जाएंगे। ऐसे में उन्हें लंबे वक्त तक कैद में रहने का डर नहीं होता।
तो, हम इस बात पर तो राज़ी हो सकते हैं कि अपराधियों को सबक सिखाना जरूरी है। मगर उन्हें कितने दिनों तक कैद में रखा जाए, इस सवाल पर मतभेद हैं। एक जुर्म के लिए अलग-अलग देशों में सजा भी अलग-अलग होती है। जैसे कि 2006 में डकैती करने वालों को फिनलैंड में 16 महीने कैद की सजा मिली। वहीं ऑस्ट्रेलिया में इसी जुर्म की सजा 72 महीने की कैद थी। इंग्लैंड में डकैती की सजा 15 महीने कैद है, तो अमरीका में इस जुर्म की सजा 60 महीने की जेल।
विज्ञापन
विज्ञापन
American jail
लंबी सजा के मामले में अमरीका अव्वल है
यही वजह है कि अमरीका में 1970 के दशक से जेल में कैद लोगों की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है। जैसे-जैसे सजा की मियाद बढ़ रही है, कैदियों की तादाद भी बढ़ रही है। आज हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए कैद लोगों की संख्या काफी बढ़ गई है।
आज की तारीख में अमरीका में सबसे ज्यादा 22 लाख लोग जेलों में कैद हैं। इससे अमरीकी अर्थव्यवस्था पर 57 अरब डॉलर सालाना का बोझ पड़ता है।
यही वजह है कि अमरीका में 1970 के दशक से जेल में कैद लोगों की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है। जैसे-जैसे सजा की मियाद बढ़ रही है, कैदियों की तादाद भी बढ़ रही है। आज हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए कैद लोगों की संख्या काफी बढ़ गई है।
आज की तारीख में अमरीका में सबसे ज्यादा 22 लाख लोग जेलों में कैद हैं। इससे अमरीकी अर्थव्यवस्था पर 57 अरब डॉलर सालाना का बोझ पड़ता है।
विज्ञापन
american jail
अमरीका के हालात
वॉशिंगटन के अर्बन इंस्टीट्यूट के जस्टिस पॉलिसी सेंटर के रेयान किंग कहते हैं कि हिंसक अपराधों के लिए कोई भी सजा लंबी नहीं लगती। पिछले 40 सालों से अमरीका में यही विचार चल रहा है।
किंग कहते हैं कि अमरीका के लिए 60 का दशक काफी उठा-पटक भरा रहा था। अमरीकी सेनाएं वियतनाम युद्ध में फंसी थीं। वहीं, घर में अमरीकी अश्वेतों के सिविल राइट्स आंदोलन का सामना कर रहे थे। इस दौरान हिंसक घटनाएं और दंगों की तादाद काफी बढ़ गई थी।
रेयान किंग कहते हैं कि राजनेता ऐसे हालात का फायदा उठाते रहे हैं। वो बताते हैं कि 60 के दशक से ही अमरीकी जेलों में बंद लोगों की संख्या बढ़नी शुरू हुई थी। 1974 में जहां अमरीका की जेलों में महज़ 2 लाख लोग कैदी थे। वहीं 2002 में ये संख्या बढ़कर 15 लाख से ज्यादा हो गई थी।
किंग के मुताबिक हर राजनेता को ये बयान देना पसंद है कि वो अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाएगा। जैसे यूपी के सीएम ने अपराधियों के एनकाउंटर की नीति पर अमल शुरू किया है। जुर्म का हाथों-हाथ हिसाब। गैरकानूनी होने के बावजूद इसे लगातार सियासी तौर पर जायज ठहराया जा रहा है।
हमारे देश में हर चुनाव में विरोधी पर अराजकता फैलाने के आरोप लगाए जाते है। फिर वादा किया जाता है कि कानून का राज कायम करेंगे। सामाजिक सोच भी लंबी सजाओं के लिए जिम्मेदार है। जैसे कि अमरीका में कहा जाता है कि अगर आप सजा भुगतने को तैयार नहीं हैं, तो जुर्म मत कीजिए।
फिर लोगों को व्यक्तिवाद के चलते अपने कर्मों का फल भोगने की सोच भी अमरीकी समाज में देखने को मिलती है। धर्म का भी काफी असर होता है, सजा की मियाद तय करने में।
वॉशिंगटन के अर्बन इंस्टीट्यूट के जस्टिस पॉलिसी सेंटर के रेयान किंग कहते हैं कि हिंसक अपराधों के लिए कोई भी सजा लंबी नहीं लगती। पिछले 40 सालों से अमरीका में यही विचार चल रहा है।
किंग कहते हैं कि अमरीका के लिए 60 का दशक काफी उठा-पटक भरा रहा था। अमरीकी सेनाएं वियतनाम युद्ध में फंसी थीं। वहीं, घर में अमरीकी अश्वेतों के सिविल राइट्स आंदोलन का सामना कर रहे थे। इस दौरान हिंसक घटनाएं और दंगों की तादाद काफी बढ़ गई थी।
रेयान किंग कहते हैं कि राजनेता ऐसे हालात का फायदा उठाते रहे हैं। वो बताते हैं कि 60 के दशक से ही अमरीकी जेलों में बंद लोगों की संख्या बढ़नी शुरू हुई थी। 1974 में जहां अमरीका की जेलों में महज़ 2 लाख लोग कैदी थे। वहीं 2002 में ये संख्या बढ़कर 15 लाख से ज्यादा हो गई थी।
किंग के मुताबिक हर राजनेता को ये बयान देना पसंद है कि वो अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाएगा। जैसे यूपी के सीएम ने अपराधियों के एनकाउंटर की नीति पर अमल शुरू किया है। जुर्म का हाथों-हाथ हिसाब। गैरकानूनी होने के बावजूद इसे लगातार सियासी तौर पर जायज ठहराया जा रहा है।
हमारे देश में हर चुनाव में विरोधी पर अराजकता फैलाने के आरोप लगाए जाते है। फिर वादा किया जाता है कि कानून का राज कायम करेंगे। सामाजिक सोच भी लंबी सजाओं के लिए जिम्मेदार है। जैसे कि अमरीका में कहा जाता है कि अगर आप सजा भुगतने को तैयार नहीं हैं, तो जुर्म मत कीजिए।
फिर लोगों को व्यक्तिवाद के चलते अपने कर्मों का फल भोगने की सोच भी अमरीकी समाज में देखने को मिलती है। धर्म का भी काफी असर होता है, सजा की मियाद तय करने में।