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वो घड़ी जो समय से भी चलती है तेज, वजह जानकर चकरा जाएगा सिर
माइक मैकइचैरन, बीबीसी ट्रैवल
Updated Sun, 23 Sep 2018 08:38 AM IST
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घड़ियां हमें सही वक्त बताने के लिए होती हैं ताकि हम वक्त पर अपने काम पूरे कर सकें। देर न हो, न ही वक्त से पहले कोई काम हो। पर, अगर घड़ी ही लेट हो जाए, या तेज चले तो? हमारा तो सारा का सारा शेड्यूल ही बिगड़ जाएगा। समय पर दफ्तर पहुंच नहीं पाएंगे। काम में देरी होगी या वक्त से पहले पहुंच जाएंगे।
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एडिनबरा की प्रिंसेस स्ट्रीट पर स्थित है बालमोरल होटल और इसी के घंटाघर में लगी ये घड़ी काफी मशहूर है। 58 मीटर ऊंचे घंटाघर को अगर एडिनबरा के काल्टन हिल इलाके से देखें तो लगता है कि ये शहर की खूबसूरत इमारतों का हर्फे-आखिर है। वेवरले ट्रेन स्टेशन के ऊपर से झांकती ये घड़ी, डुगाल्ड स्टेवर्ट स्मारक के करीब है।
इसे एडिनबरा कासल से देखें तो यूं लगता है कि सदियों पहले इस महल के इर्द-गिर्द हुई जंगों की गवाह है ये घड़ी। हालांकि ये उतनी पुरानी है नहीं। ग्रीनविच मीनटाइम यानी जीएमटी से तीन मिनट आगे इस घड़ी के पीछे अजब सोच है। पहली दफा 1902 में बालमोरल होटल को खोला गया था। इसे उस वक्त नॉर्थ ब्रिटिश स्टेशन होटल नाम दिया गया था।
उस वक्त मानो ये वेवरले स्टेशन की पहरेदार के तौर पर वहां खड़ी होती थी। इलाके में ट्रेनों की आवाजाही के लिए जिम्मेदार कंपनी नॉर्थ ब्रिटिश रेलवे कंपनी ने ये घड़ी मानो इसलिए वहां लगा दी थी कि कोई भी मुसाफिर लेट न हो। होटल और रेलवे कंपनी के प्रबंधकों का मानना था कि जब मुसाफिरों के पास तीन मिनट ज्यादा वक्त होगा तो वो आराम से टिकट ले सकेंगे। गाड़ियों से अपना सामान उतार कर ट्रेन में रख सकेंगे। मगर, आज भी बेवक्त की चाल चलने वाली इस घड़ी की तेजी, एडिनबरा शहर को वक्त का पाबंद बनाए रखती है।
इसे एडिनबरा कासल से देखें तो यूं लगता है कि सदियों पहले इस महल के इर्द-गिर्द हुई जंगों की गवाह है ये घड़ी। हालांकि ये उतनी पुरानी है नहीं। ग्रीनविच मीनटाइम यानी जीएमटी से तीन मिनट आगे इस घड़ी के पीछे अजब सोच है। पहली दफा 1902 में बालमोरल होटल को खोला गया था। इसे उस वक्त नॉर्थ ब्रिटिश स्टेशन होटल नाम दिया गया था।
उस वक्त मानो ये वेवरले स्टेशन की पहरेदार के तौर पर वहां खड़ी होती थी। इलाके में ट्रेनों की आवाजाही के लिए जिम्मेदार कंपनी नॉर्थ ब्रिटिश रेलवे कंपनी ने ये घड़ी मानो इसलिए वहां लगा दी थी कि कोई भी मुसाफिर लेट न हो। होटल और रेलवे कंपनी के प्रबंधकों का मानना था कि जब मुसाफिरों के पास तीन मिनट ज्यादा वक्त होगा तो वो आराम से टिकट ले सकेंगे। गाड़ियों से अपना सामान उतार कर ट्रेन में रख सकेंगे। मगर, आज भी बेवक्त की चाल चलने वाली इस घड़ी की तेजी, एडिनबरा शहर को वक्त का पाबंद बनाए रखती है।
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साल में एक दिन सही समय बताती है घड़ी
होटल आने वाले लोगों को घड़ी दिखाने वाले गाइड इयान डेविडसन कहते हैं कि, "ये एडिनबरा की सबसे दिलचस्प मगर खुफिया जगह है। लोग अक्सर सोचते हैं कि ऊपर से देखने पर शहर की सड़कें और गलियां कैसी दिखती हैं।" डेविडसन बताते हैं कि 1902 से लेकर अब तक यानी 116 सालों में इस घड़ी में एक ही बदलाव आया है। पहले जहां ये घड़ी हाथ से चलाई जाती थी, वहीं अब ये बिजली से चलती है।
वैसे, ये घड़ी हर वक्त गलत समय बताती है, ऐसा भी नहीं है। हर नए साल की पूर्व संध्या पर यहां एक इंजीनियर भेजा जाता है जो घड़ी का वक्त सही करे ताकि नए साल की परेड सही वक्त पर ही निकले। डेविडसन कहते हैं कि उस एक दिन के सिवा सब को लगता है कि ये घड़ी गलत समय बताती है।
घड़ी में भले ही 116 में कोई बदलाव न आया हो, इसके इर्द-गिर्द एडिनबरा में बहुत कुछ बदल गया है। दूसरे विश्व युद्ध के खात्मे के बाद 1948 में ब्रिटेन ने रेलवे का राष्ट्रीयकरण कर दिया। भाप के इंजन बंद हो गए। नॉर्दर्न ब्रिटिश स्टेशन होटल का ताल्लुक़ भी रेलवे से खत्म हो गया। 1990 में इस होटल को नया नाम दिया गया- द बालमोरल होटल। मालिक बदले तो करोड़ों रुपए लगाकर होटल को नए सिरे से संवारा गया। नहीं बदला, तो घड़ी का गलत होना।
होटल आने वाले लोगों को घड़ी दिखाने वाले गाइड इयान डेविडसन कहते हैं कि, "ये एडिनबरा की सबसे दिलचस्प मगर खुफिया जगह है। लोग अक्सर सोचते हैं कि ऊपर से देखने पर शहर की सड़कें और गलियां कैसी दिखती हैं।" डेविडसन बताते हैं कि 1902 से लेकर अब तक यानी 116 सालों में इस घड़ी में एक ही बदलाव आया है। पहले जहां ये घड़ी हाथ से चलाई जाती थी, वहीं अब ये बिजली से चलती है।
वैसे, ये घड़ी हर वक्त गलत समय बताती है, ऐसा भी नहीं है। हर नए साल की पूर्व संध्या पर यहां एक इंजीनियर भेजा जाता है जो घड़ी का वक्त सही करे ताकि नए साल की परेड सही वक्त पर ही निकले। डेविडसन कहते हैं कि उस एक दिन के सिवा सब को लगता है कि ये घड़ी गलत समय बताती है।
घड़ी में भले ही 116 में कोई बदलाव न आया हो, इसके इर्द-गिर्द एडिनबरा में बहुत कुछ बदल गया है। दूसरे विश्व युद्ध के खात्मे के बाद 1948 में ब्रिटेन ने रेलवे का राष्ट्रीयकरण कर दिया। भाप के इंजन बंद हो गए। नॉर्दर्न ब्रिटिश स्टेशन होटल का ताल्लुक़ भी रेलवे से खत्म हो गया। 1990 में इस होटल को नया नाम दिया गया- द बालमोरल होटल। मालिक बदले तो करोड़ों रुपए लगाकर होटल को नए सिरे से संवारा गया। नहीं बदला, तो घड़ी का गलत होना।
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वो परिवार जो इस घड़ी का रख-रखाव करता है
इस घड़ी का रख-रखाव स्मिथ ऑफ डर्बी नाम का घड़ी बनाने वाला परिवार करता है। इस परिवार की पांचवीं पीढ़ी के पास ही बालमोरल होटल की मशहूर घड़ी के रख-रखाव का जिम्मा आज भी है। इस परिवार के पास लंदन के सेंट पॉल गिरजाघर की मशहूर घड़ी और मस्कट की मजलिस ओमान में लगी घड़ी के रख-रखाव की जिम्मेदारी भी है।
इस कंपनी के पास चीन के गांझाऊ स्थित 12.8 मीटर चौड़ी पेंडुलम वाली घड़ी की रखवाली का काम भी है। कंपनी के टोनी चार्ल्सवर्थ कहते हैं कि, "हम दुनिया भर में 5000 से ज्यादा घड़ियों की जिम्मेदारी संभालते हैं। इनमें से द बालमोरल होटल की घड़ी को सबसे खास कहना गलत होगा। वो कहते हैं कि यूं तो उनका जिम्मा सभी घड़ियों को सही वक्त दिखाने का है। मगर बालमोरल होटल की घड़ी को गलत वक्त बताते हुए दिखाने के पैसे उन्हें मिलते हैं।"
इस घड़ी का रख-रखाव स्मिथ ऑफ डर्बी नाम का घड़ी बनाने वाला परिवार करता है। इस परिवार की पांचवीं पीढ़ी के पास ही बालमोरल होटल की मशहूर घड़ी के रख-रखाव का जिम्मा आज भी है। इस परिवार के पास लंदन के सेंट पॉल गिरजाघर की मशहूर घड़ी और मस्कट की मजलिस ओमान में लगी घड़ी के रख-रखाव की जिम्मेदारी भी है।
इस कंपनी के पास चीन के गांझाऊ स्थित 12.8 मीटर चौड़ी पेंडुलम वाली घड़ी की रखवाली का काम भी है। कंपनी के टोनी चार्ल्सवर्थ कहते हैं कि, "हम दुनिया भर में 5000 से ज्यादा घड़ियों की जिम्मेदारी संभालते हैं। इनमें से द बालमोरल होटल की घड़ी को सबसे खास कहना गलत होगा। वो कहते हैं कि यूं तो उनका जिम्मा सभी घड़ियों को सही वक्त दिखाने का है। मगर बालमोरल होटल की घड़ी को गलत वक्त बताते हुए दिखाने के पैसे उन्हें मिलते हैं।"
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टोनी बताते हैं कि 2012 में ये घड़ी पूरे 90 मिनट लेट हो गई थी। उस वक्त प्रिंसेस स्ट्रीट पर चलने वाली ट्राम सेवा की बिजली उसके कर्मचारियों ने काट दी थी। दो साल पहले ये घड़ी अचानक बंद हो गई थी। 108 साल में ऐसा पहली बार हुआ था जब ये घड़ी बंद हुई थी।
टोनी कहते हैं कि आज लोगों के पास स्मार्टफोन और स्मार्टवाच हैं। फिर भी वो इस घड़ी पर भरोसा करते हैं और इसके गलत वक्त को सही करने के लिए उन्हें कभी नहीं कहा गया। वो कहते हैं कि आने वाले वक्त में भी ये घड़ी गलत वक्त ही बताती रहेगी। टोनी कहते हैं कि इस घड़ी का गलत समय बताना एडिनबरा की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। अब अगर इसे सही किया जाएगा, तो लोग इसे मंजूर नहीं करेंगे। बड़े योजनाबद्ध तरीके से बसे एडिनबरा शहर में सालाना लगने वाले मेलों और सब कुछ नियत जगह होने के बाद, आपको इस घड़ी की मदद से जिंदगी के तीन मिनट ज्यादा मिलते हैं।
टोनी कहते हैं कि आज लोगों के पास स्मार्टफोन और स्मार्टवाच हैं। फिर भी वो इस घड़ी पर भरोसा करते हैं और इसके गलत वक्त को सही करने के लिए उन्हें कभी नहीं कहा गया। वो कहते हैं कि आने वाले वक्त में भी ये घड़ी गलत वक्त ही बताती रहेगी। टोनी कहते हैं कि इस घड़ी का गलत समय बताना एडिनबरा की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। अब अगर इसे सही किया जाएगा, तो लोग इसे मंजूर नहीं करेंगे। बड़े योजनाबद्ध तरीके से बसे एडिनबरा शहर में सालाना लगने वाले मेलों और सब कुछ नियत जगह होने के बाद, आपको इस घड़ी की मदद से जिंदगी के तीन मिनट ज्यादा मिलते हैं।