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इस तरह हो रही है वक्त को थामने की कोशिश, अब तक यह फिल्मों में ही देखा होगा आपने

Mon, 20 Aug 2018 10:14 AM IST
पीटर रे एलीसन, बीबीसी हिंदी
पीटर रे एलीसन, बीबीसी हिंदी Updated Mon, 20 Aug 2018 10:14 AM IST
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साहिर लुधियानवी ने लिखा था- वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज, वक्त की हर शह गुलाम, वक्त का हर शह पे राज। तो, गालिब ने लिखा था- मैं गया वक्त नहीं के लौट के फिर आ भी न सकूं। अमरीकी कवि डेलमोर स्वार्ज ने लिखा था - वक्त वो आग है जिसमें हम जलते हैं। हम पैदा होते हैं, जीते हैं और मर जाते हैं। समय अपनी रौ में चलता रहता है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि इंसान ने बारहां ये सोचा है कि वो वक्त का पहिया थाम ले। वक्त से आंखें फेर ले। वक्त का रुख मोड़ दे। वक्त बदल दे। कालचक्र की रफ्तार धीमी कर दे, या वक्त से आगे निकल जाए। इंसान के इस ख्वाब को बहुत स- साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखाया गया है, फॉरएवर यंग से लेकर स्लीपिंग ब्यूटी तक।
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1971 में जोसेफ हफेल और रिचर्ड कीटिंग ने चार एटॉमिक क्लॉक विमानों में रखी। इन विमानों ने दुनिया का दो बार चक्कर लगाया। पहले पूरब की तरफ से। फिर पश्चिम की तरफ। अब दुनिया गोल है, तो उनके चक्कर लगाने में फासला तो एक सा ही तय हुआ। रफ्तार एक थी, तो वक्त भी उतना ही लगना चाहिए था, लेकिन, जब एटॉमिक क्लॉक को देखा गया, तो पता चला कि उनमें फर्क था। इस तजुर्बे से एक बात साफ हो गई कि वक्त जिस तरह गुजरता है, वो हालात पर निर्भर करता है। अमरीका की नॉर्थ कैरोलाइना स्टेट यूनिवर्सिटी की केटी मैक कहती हैं कि, 'अगर आप रोशनी की रफ्तार से सफर कर रहे हैं, और आप ब्लैक होल के आस-पास हैं, तो जो वक्त आप सफर के तजुर्बे में महसूस करेंगे, वो कहीं और बिताए समय से कम होगा।'

अंतरिक्ष यात्रियों की धीमी जिंदगी

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों की उम्र की रफ्तार धीमी हो जाती है। धरती पर रहने वालों के मुकाबले उनकी जिंदगी धीमी हो जाती है। अमरीकी वैज्ञानिक केटी मैक कहती हैं, 'अंतरिक्ष यात्री बड़ी तेजी से धरती का चक्कर लगा रहे स्पेस स्टेशन पर सवार होते हैं। उन पर धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का असर भी कम होता है। इसलिए उनकी उम्र की रफ्तार धीमी हो जाती है।' हालांकि, अंतरिक्ष यात्रियों की जिंदगी के वक्त का ये ठहराव बेहद मामूली होता है। कुछ सेकेंड का होता है। हमें धरती के मुकाबले अपनी उम्र को गुजरने से ठहराने के लिए सुदूर अंतरिक्ष में बेहद तेज रफ्तार से दूरी तय करनी होगी। फिलहाल ये नामुमकिन है। साइंस फिक्शन की कॉमेडी सिरीज 'रेड ड्वार्फ' में एक कल्पना की गई है। इस सिरीज में एक किरदार है लिस्टर जिसकी जिंदगी में ठहराव आ जाता है। वक्त उसके आर-पार या इर्द-गिर्द नहीं गुजरता। वो ठहर जाता है। अब ये तो रही फिक्शन या कल्पना की बात।
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वक्त के पहिए थामने की कोशिश

वक्त भले ही सापेक्षता के सिद्धांत से चलता हो। मतलब ये कि वक्त भले ही किसी जगह, किसी माहौल और किसी शख्स के हिसाब से गुजरता हो, मगर ये हमारे अस्तित्व की बुनियाद है। समय को लेकर हमारी सोच बदलना तो आसान है। मगर वक्त के पहिए को रोक लेना बहुत बड़ी चुनौती है। बुरा वक्त भले ही भारी गुजरता हो। अच्छा समय भले ही आप के हिसाब से जल्दी से उछल-कूद मचाकर चला जाता हो, मगर वक्त का क्या है, गुजरता है, गुजर जाएगा। पर, इंसान ने हार नहीं मानी है। वो वक्त के पहिए को थामने में जुटा हुआ है। अमरीका की डिफेंस सेक्टर की कंपनी डारपा इस वक्त समय के पहिए को थामने पर रिसर्च कर रही है। डारपा एक ऐसा रिसर्च कर रही है जिसमें जख्मी सैनिक के शरीर के अंगों के काम करने की रफ्तार धीमी की जा सके ताकि जब तक उसे मेडिकल इमदाद नहीं मिले, तब तक उसके घाव और न खराब हों। इसे 'बायोस्टैसिस' कहते हैं। इसमें किसी इंसान के शरीर के अंगों की रफ्तार धीमी की जाती है। इस तकनीक से हम बीमार लोगों की हालत बिगड़ने से रोक सकते हैं। खास तौर से जंग में घायल सैनिकों की मदद में ये तकनीक तो बहुत काम आ सकती है।

डारपा में इस प्रोजेक्ट के मैनेजर डॉक्टर त्रिस्तान मैक्लूयर-बेग्ले कहते हैं कि ऐसा करना बायोइंजीनियरिंग की मदद से संभव है। शरीर में मौजूद प्रोटीन की बनावट में हेर-फेर से हम अंगों के काम करने की रफ्तार धीमी कर सकते हैं। अगर डारपा का ये प्रयोग कारगर रहता है तो बायोस्टैसिस से मेडिकल की दुनिया में बहुत से काम लिए जा सकते हैं। ब्लड बैंक में रखे खून की मियाद बढ़ाई जा सकती है। ऐसी ही दूसरी बायो-मेडिकल चीजों को हम ज्यादा समय तक सुरक्षित रख सकते हैं। डॉक्टर त्रिस्तान कहते हैं कि 'इस तकनीक की मदद से हम वैक्सीन, एंटीबॉडी और एंजाइम को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं। अभी तो इन्हें जमाकर रखना पड़ता है, जो काफी महंगा होता है।' फिलहाल तो बायोस्टैटिस यानी जैविक ठहराव का ये प्रयोग सेहत के मोर्चे पर किया जा रहा है। इस मामले में हमें कुदरत से सीखने को मिल सकता है।
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जानवरों में बायोस्टैसिस
बहुत से जीव हैं जो बायोस्टैसिस की मदद से खुद को मरने से बचाते हैं जैसेकि जंगली मेंढक। सर्दियों के दिनों में मेंढक के शरीर की कमोबेश सारी जैविक प्रक्रियाएं थम जाती हैं। वो जम जाता है। इसी तरह भालू भी सर्दियों में हाइबरनेशन यानी शीतनिद्रा की स्टेज में चले जाते हैं। उनके शरीर की जैविक क्रियाएं बहुत धीमी हो जाती हैं। वो सर्दियां बीत जाने पर, कई महीनों बाद इस हालात से बाहर आते हैं। फिर से जिंदगी की दौड़-भाग शुरू कर देते हैं। इंसान भी मेडिकल साइंस में ऐसे प्रयोग करता है। जैसे दिल का दौरा पड़ने या दिमाग़ को चोट लगने पर कई बार कृत्रिम तरीके से इंसान की जैविक क्रियाओं को धीमा किया जाता है ताकि उस इंसान की जान बचाई जा सके। नासा अपने मंगल अभियान के लिए ऐसे प्रयोग कर रहा है जिसके तहत वो अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर की जैविक गतिविधियों की रफ्तार धीमी करने का इरादा रखता है ताकि वो ज्यादा वक्त धरती से दूर बिता सकें।

इस प्रक्रिया की शुरुआत में दवा की मदद से इंसान को अचेत किया जाएगा। फिर उसे उसी हालत में रखा जाएगा और जरूरत पड़ने पर उसे फिर से होश में लाया जाएगा। स्पेसवर्क्स नाम की कंपनी के लिए काम करने वाले जॉन ब्रैडफोर्ड कहते हैं कि,'हम ऐसी दवाएं ईजाद करने पर काम कर रहे हैं, जो अचेत करने वाली दवाओं के बुरे असर को कम कर सकें और इंसान की जैविक क्रियाओं की रफ्तार को बिना हेवी डोज के धीमा कर सकें।' अगर हमारे शरीर का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाए, तो हमारे शरीर के भीतर चलने वाली क्रियाओं की रफ्तार आधी रह जाती है। इससे उम्र पचास फीसद तक बढ़ सकती है। जो जानवर शीत निद्रा या हाइबरनेशन की प्रक्रिया से गुजरते हैं, वो ज्यादा दिनों तक जीते हैं। जॉन ब्रैडफोर्ड कहते हैं कि अगर आप छह महीने तक शीतनिद्रा में रहते हैं, तो आप की उम्र तीन महीने तक बढ़ सकती है। हालांकि, फिलहाल इंसान की उम्र बढ़ाने के बजाय, रिसर्चरों का मकसद कुछ और है। फिलहाल तो अंगदान का इंतजार करने वाले लोगों और दूसरी बीमारियों के शिकार इंसानों की मदद के लिए इस तकनीक के विकास पर काम किया जा रहा है।
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फ्रीज करके जिंदा करने की उम्मीद
ये तो हुई जैविक क्रियाएं धीमी करने की बात। हमने बहुत-सी फिल्मों में देखा है कि इंसान को फ्रीज कर दिया गया। फिर वो दस-बीस साल बाद उसी हालत में सक्रिय हो गया जब उसे फ्रीज किया गया था। जैसे फॉरएवर यंग फिल्म। किसी भी चीज को भयंकर ठंड में जमाने की तकनीक को क्रायोनिक्स कहते हैं। इसमें शरीर को -190 डिग्री सेल्सियस तापमान पर जमा दिया जाता है। मकसद, बाद में मरीज को फिर से जिंदा हालत में वापस लाना। लेकिन, किसी को ऐसे जमाना इतना आसान नहीं है। इसके लिए शरीर से खून को पूरी तरह से निकाल कर उसके शरीर में क्रायो-सॉल्यूशन डाला जाता है। यानी उन्हें उसी हालत में नहीं रखा जाता। 

बल्कि उनके अंदर जमा देने वाला सॉल्यूशन भरा जाता है। तब इंसान का शरीर जमी हुई बर्फ सरीखा दिखता है। क्रायोनिक्स तकनीक का इस्तेमाल किसी इंसान के दिल की धड़कन रुकने के बाद ही होता है। वो भी इस उम्मीद में कि भविष्य में मेडिकल साइंस इतनी तरक्की कर लेगा कि उस शख्स के दिल को फिर से धड़काया जा सकेगा। इसी उम्मीद में दुनिया भर में बहुत से लोगों ने अपने परिजनों को क्रायोनिक्स की मदद से जमा कर रखा है। मगर अभी इस प्रयोग के दूसरे सिरे यानी जमाए गए शरीर में फिर से जान डालने की कामयाबी तक हम नहीं पहुंचे हैं।

अभी तक ऐसा चमत्कार सिर्फ क़ुदरत ही दिखा सकी है। 2001 में कनाडा के एडमॉन्टन की रहने वाली 13 बरस की लड़की एरिका नॉरबी की धड़कन दो घंटे बंद रहने के बाद फिर से शुरू हो गई थी। दो घंटे तक भयंकर सर्दी में उसकी धड़कन बंद रही थी।  यानी तकनीकी रूप से वो मर चुकी थी। बहुत से लोगों को ये उम्मीद है कि आगे चल कर साइंस की मदद से हम ऐसा कर सकेंगे। वैसे, वक्त हमारी हकीकत की बुनियाद है। हम इसे धीमा या तेज तो शायद कर लें, रोक नहीं सकते। फिर वक्त की रफ्तार धीमी करने के लिए भी इतनी पेचीदा प्रक्रियाओं से गुज़रना होगा कि वो करना भी फिलहाल असंभव-सा दिखता है। देखना ये है कि बायो-इंजीनियरिंग से हम वक्त को चकमा दे पाएंगे या नहीं ? डॉक्टर त्रिस्तान कहते हैं कि, 'हो सकता है कि ऐसा आगे चल कर संभव हो, मगर इसके लिए आप अपनी रातों की नींद न उड़ाएं।'

 
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