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जब एक 'चुड़ैल' ने बचायी सैकड़ों लोगों की जान तो देखने वाले भी रह गए हैरान

Sun, 23 Dec 2018 04:56 PM IST
गौरव शुक्ला बीबीसी हिंदी, नई दिल्ली
बीबीसी हिंदी, नई दिल्ली Published by: गौरव शुक्ला Updated Sun, 23 Dec 2018 04:56 PM IST
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Rwandan genocide, this woman rescued more than 100 lives with her courage
RWANDA GENOCIDE - फोटो : Social Media

धारधार कुल्हाड़ियां लिए भीड़ ने जब जूरा कारूहिंबी के घर को घेर कर अंदर शरण लिए लोगों को बाहर निकालने की मांग की तो उस वक्त वो बिलकुल निहत्थी थीं। उनके पास अगर कुछ था तो जादुई शक्तियों की उनकी साख थी। यही साख और इससे हथियारबंद लोगों के मन में पैदा हुआ वो डर ही था जिसने उन सौ से अधिक लोगों की जान बचा दी जो अपनी जान बचाने के लिए उनके घर के भीतर छिपे थे। ये रवांडा में हुए जनसंहार के दिनों की बात है। 1994 में शुरू हुए इस नरसंहार में रवांडा के तुत्सी समुदाय के करीब आठ लाख लोग मारे गए थे। 

Rwandan genocide, this woman rescued more than 100 lives with her courage
- फोटो : Social Media

मारे गए इन लोगों में हमलावर हूतू समुदाय के उदारवादी लोग भी शामिल थे। इन में कारूहिंबी की पहली बेटी भी थीं। इस नरसंहार के दो दशक बाद अपने दो छोटे कमरों के घर में द इस्ट अफ्रीकन से बात करते हुए उन्होंने कहा था। "उस नरसंहार के दौरान मैंने इंसान के दिल का कालापन देखा था।" इसी घर में उन्होंने उन लोगों को छुपाया था और उनकी जान बचायी थी। बीते सोमवार को रवांडा की राजधानी किगाली से करीब एक घंटे की दूरी पर पूर्व में स्थित मासूमो गांव में जूरा कारूहिंबी की मौत हो गई। किसी को नहीं पता है कि वो कितने साल की थीं। अधिकारिक दस्तावेजों में उनकी उम्र 93 साल है जबकि वो अपने आप को सौ बरस से ज्यादा का बताती थीं। जो भी हो, लेकिन जब हूतू मिलिशिया ने उनके गांव पर हमला किया था तब वो बहुत युवा नहीं थीं।

पारंपरिक ओझा परिवार में पैदा हुईं थीं कारूहिंबी

Rwandan genocide, this woman rescued more than 100 lives with her courage
जूरा कारूहिंबी - फोटो : Social Media

कारूहिंबी के बारे में जो बहुत सी कहानियां लिखी गई हैं उनके मुताबिक वो एक पारंपरिक ओझा परिवार में 1925 में पैदा हुईं थीं। जन्म का ये साल उनके अधिकारिक पहचान पत्र से लिया गया है। ये कहा जा सकता है कि 1994 की घटनाओं के तार उनके बचपन से ही जुड़ने शुरू हो गए थे। यही वो दौर था जब रवांडा पर बेल्जियम का शासन हुआ और इस ओपनिवेशिक शक्ति ने रवांडा के लोगों को स्पष्ट रूप से बंटे हुए समूहों में बांट दिया। पहचान पत्र जारी करके लोगों को बता दिया गया कि वो हूतू हैं या तुत्सी। 

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Rwandan genocide, this woman rescued more than 100 lives with her courage
- फोटो : Social Media

कारूहिंबी का परिवार हूतू था और ये समुदाय रवांडा में बहुसंख्यक था। लेकिन अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों को उच्च वर्गीय समझा जाता था और यही वजह थी कि बेल्जियम के शासनकाल में नौकरियों और व्यापार में इसी समूह का बोलबाला था। इस बंटवारे ने दोनों समूहों के बीच तनाव भी पैदा किया। 1959 में कारुहिंबी युवा ही थीं जब तुत्सी राजा किगेरी पंचम और उनके दसियों हजार तुत्सी समर्थकों को पड़ोसी उगांडा में शरण लेनी पड़ी। ये रवांडा में हुई हूती क्रांति के बाद की बात है। जब 1994 में हूतू राष्ट्रपति जुवेनाल हेब्यारिमाना का विमान मार गिरा दिए जाने के बाद तुत्सियों के खिलाफ हिंसा शुरू हुई तो ये पहली बार नहीं था जब कारूहिंबी ने इस तरह की हिंसा देखी थी। लेकिन उन्हें ये अंदाजा बिलकुल नहीं था कि हालात इतने ज्यादा खराब हो जाएंगे। अपनी जान बचाने के लिए हूतू लोगों ने अपनी तुत्सी मूल की पत्नियों तक को मारना शुरू कर दिया था। किगाली नरसंहार स्मारक से उन्होंने कहा था, "मैं सोचती थी कि अगर वो मरेंगे तो मैं भी मर जाउंगी।"

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'अपनी कब्रें खोदना'

Rwandan genocide, this woman rescued more than 100 lives with her courage
- फोटो : Social Media

हिंसा शुरू होने के बाद मुसामो गांव में कारूहिंबी का घर तुत्सियों के लिए पनाहगाह बन गया। नरसंहार के दौरान यहां सिर्फ तुत्सियों ने ही नहीं बल्कि बुरूंडी के लोगों और तीन यूरोपीय नागरिकों ने भी यहां शरण ली। रिपोर्टों के मुताबिक दर्जनों लोग उनके बिस्तर के नीचे छुपे थे जबकि छत में बनी गुप्त जगह में भी कई लोगों ने पनाह ली। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि कारूहिंबी ने अपने खेत में गड्ढा करके भी लोगों को छुपाया था। कारूहिंबी के मुताबिक कुछ ऐसे बच्चों को भी उन्होंने छुपाया था जिन्हें उनकी मारी गई माओं की पीठ से उतारा गया था। जैसे कि उनकी उम्र के बारे में किसी को स्पष्ट जानकारी नहीं है ये भी किसी को साफतौर पर नहीं पता कि उन्होंने कुल कितने लोगों की जान बचायी।

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