....'आई लव यू' ये उनके आखिरी शब्द थे फिर उन्होंने नमाज पढ़ी। हत्या के दोषी चार्ल्स ब्रूक्स जूनियर ने अपनी गर्लफ्रेंड (प्रेमिका) को दूर से देखा और महसूस किया कि मौत उनकी रगो में रेंग रही है। 80 के दशक के लिबास, सुनहरी पैंट और खुले बटन की शर्ट में सफेद स्ट्रेचर पर पड़े वो डॉक्टरों से घिरे हुए थे और उनके एक हाथ में नस के जरिए जहर का इंजेक्शन लगा था। 1982 की यह घटना, वो पहला मौका था जब अमरीका में किसी अपराधी को मृत्युदंड के लिए इस तरह के घातक इंजेक्शन का इस्तेमाल किया गया। इस तरीके को अमल में लाने से पहले इलेक्ट्रिक कुर्सी पर बैठा कर मौत की सजा दी जाती थी जिसे आज व्यापक रूप से यातना माना जाता है। यह इतना हिंसक था कि कभी कभी अपराधी की आंखें बाहर निकल कर उसके गालों पर झूल जाती थीं। जहर का इंजेक्शन इस मायने में बेहतर था कि इसमें ना तो खून बहता था और ना ही चीख। पर इस तरीके पर भी सवाल उठे कि क्या ये उतना ही शांतिपूर्ण है जितना दिखाई देता है क्योंकि इस पर कोई परीक्षण नहीं किया गया।
वो प्रेमिका से 'आई लव यू' बोले, नमाज पढ़ी और लेटते ही दम तोड़ गए, पढ़ें मौत देने के अनोखे तरीके
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पश्चिमी देशों में ये बहस छिड़ी हुई है। मौत की सजा पाने वाले किसी इंसान को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए कि उसे तकलीफ न हो। क्या किसी को मौत की नींद सुलाने का ऐसा तरीका है, जो बेरहम न हो? दुनिया में तमाम देश हैं जहां मौत की सजा नहीं दी जाती। भारत, दुनिया के उन देशों की सूची में शामिल है, जहां मौत की सजा दी जाती है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौत की सजा बंद करने पर बहस होती रही है। भारत में सजायाफ्ता मुजरिम को मौत की सजा देने का एक ही तरीका है, फांसी। वहीं, अमरीका जैसे कई देश हैं, जो घातक इंजेक्शन के जरिए मौत की सजा पाए इंसान को मौत की नींद सुलाते हैं। तारीख के पन्ने पलटें तो सभ्यता का हजारों सालों का इतिहास मौत के घाट उतारने के ऐसे तमाम तरीकों के किस्सों से भरा पड़ा है।
एक दौर था, जब सरेआम जुर्म की सजा दी जाती थी। सऊदी अरब से लेकर ईरान तक कई देशों में, आज भी कई जुर्मों की सजा सरेआम दी जाती है ताकि लोग सबक ले सकें। लेकिन, बात पहले के दौर की। जब मौत की सजा पाने वाले को बोरे में बांधकर खूंखार जानवरों के बीच, पानी में धकेल दिया जाता था। कई देशों में तो पीठ की तरफ से लोगों के फेफड़े निकालकर उन्हें मारा जाता था। सिर कलम करने का तरीका, मौत की सजा देने का सब से आम तरीका था। भारत में नाराज होने पर राजा-महाराजा और बादशाह एक से एक तरीके से मौत की सजा देते थे। कभी हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया जाता था तो कभी जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया जाता था और कभी ऊंची इमारत से फेंक कर मौत की सजा दी जाती थी कई बार इंसानों को शेर या बाघ जैसे खूंखार जानवरों के बाड़े में मरने के लिए फेंक दिया जाता था।
फारस, यानि आज के ईरान में किसी शख्स को दो नावों के बीच में दबाकर उसे शहद और दूध से नहला दिया जाता था। कीड़े उस इंसान को धीरे-धीरे खा जाते थे। अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांस में क्रांति की शुरुआत में फ्रेंच रईसों को बड़ी बेरहमी से मारा गया। किसी का सिर कुल्हाड़ी से काट डाला गया तो किसी का पत्थर से फोड़ कर इसे मौत के घाट उतार दिया गया। फ्रेंच क्रांति के आखिरी दिनों में गिलोटिन से फांसी दी जाने लगी। हुआ यूं था कि फ्रांस के एक डॉक्टर जोसेफ इग्नेस गिलोटिन को महसूस हुआ कि मौत की सजा देने में भी इंसानियत होनी चाहिए। डॉक्टर गिलोटिन ने एलान किया कि अब मौत के घाट उतारे जाने वाले का सिर पलक झपकते ही धड़ से अलग करने का ये तरीका ही इस्तेमाल होगा। वैसे, डॉक्टर ने गिलोटिन ईजाद नहीं किया था, मगर इसकी वकालत के चलते डॉक्टर का नाम मौत देने के इस तरीके को मिल गया।
लेकिन, गिलोटिन से मौत की सजा कितनी कम दर्दनाक थी, इसका पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में कुछ चूहों पर प्रयोग किए गए। कुछ प्रयोगों के लिए चूहों को ऐसे मारा जाता है। 1975 में हुई रिसर्च से पता चला कि मारे गए चूहों को 9 से 18 सेकेंड तक मरने से पहले तड़प झेलनी पड़ी। ये तजुर्बा बाद में कुछ और जानवरों पर रिसर्च में भी सही पाया गया। साफ है कि गिलोटिन से मारे जाने वाले इंसानो को भी ऐसे ही दर्दनाक लम्हों से गुजरना होता होगा। सऊदी अरब जैसे कई देश हैं, जहां अभी भी लोगों को सिर कलम कर के मौत के घाट उतारा जाता है। साल 2017 में ही सऊदी अरब में 146 लोगों का सिर काट कर उन्हें मौत की सजा दी गई। लेकिन, आज की तारीख में मौत की सजा वाले ज्यादातर देशों में लोगों को फांसी पर लटकाया जाता है।