पिछले हफ्ते लाइबेरियाई सरकार ने जानकारी दी कि उसके 10.4 करोड़ डॉलर यानी तकरीबन 750 करोड़ रुपये का नुकसान हो गया है। ऐसा नहीं है कि ये किसी तरह का नुकसान था जो लाइबेरिया को गलत निवेश या किसी धोखाधड़ी के कारण हुआ, बल्कि देश की नकदी सचमुच गायब हो गई।
आखिर देश क्यों कराते हैं दूसरे देश में नोटों की छपाई, वजह है चौंकाने वाली
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क्या ये बेहद आम बात है?
कुछ देश जैसे भारत सारे नकदी की छपाई अपने देश में ही करते हैं। अमरीका भी अपनी मुद्रा को कानूनन अपने ही देश में छापने के लिए बाध्य है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जहां नोटों की छपाई विदेशों में होना बेहद सामान्य बात है। अगर लाइबेरिया की बात करें तो वहां छपाई केंद्र ही नहीं हैं।
इस क्षेत्र में कई दिग्गज कंपनियां हैं जो ज्यादातर देशों के लिए नोटों की छपाई का काम करती है। बैंक नोट बनाने वाली कंपनी डे ला रुए के मुताबिक व्यवसायिक प्रिंट बाजार कुल नकदी का 11 फीसदी तक व्यापारिक तौर पर छापा जाता है। इस क्षेत्र की ज्यादातर बड़ी कंपनियां यूरोप और उत्तर अमरीका की हैं। ब्रितानी कंपनी डे ला रुए दुनिया की सबसे बड़ी नोटों की छपाई करने वाली कंपनी है।
ये कंपनी लगभग 140 देशों के केंद्रीय बैंक के लिए नकदी छपाई का काम करती है। हर हफ्ते ये कंपनी इतने नोटों की छपाई करती है कि इसे अगर इकट्ठा करके पहाड़ बनाया जाए तो एवरेस्ट की चोटी को दो बार छू लेने वाला पहाड़ बनेगा। इसकी प्रतिद्वंदी जर्मनी की कंपनी गीसेक एंड डर्विएंट लगभग 100 केंद्रीय बैंको के लिए नोटों की छपाई का काम करता है। इसके अलावा कैनेडियन बैंकनोट कंपनी और अमरीका-स्वीडन की क्रेन कंपनी इस क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां हैं। ये एक बड़ा और गुप्त व्यापार है।
बीबीसी ने जब इन कंपनियों से संपर्क किया तो उन्होंने ये बताने से इनकार कर दिया कि वे किन-किन देशों के केंद्रीय बैंकों के लिए नोटों की छपाई करते हैं। ज्यादातर सरकारें इस बाबत बात भी नहीं करना चाहती हैं। भारत के लोगों के बीच नोटों की छपाई की खबर को लेकर जो रोष सामने आया उससे ये समझा जा सकता है कि कैसे नोटो की छपाई कहां हो रही है ये आम लोगों के लिए संवेदनशील विषय है। डरहम यूनिवर्सिटी के पैसों के इतिहास के विशेषज्ञ डनकेन कॉनोर्स कहते हैं, ''ये लोगों के लिए राष्ट्रीयता का विषय बन जाता है। ''
आखिर देश खुद नोट क्यों नहीं छापते?
ये एक कठिन और बेहद खर्चीली प्रक्रिया है। सोलोमॉन द्विप अपनी मुद्रा की छपाई देश के बाहर कराता है। इसके लिए नोट छापने वाली कंपनी कुछ 100 साल पुरानी है। डे ला रुए ने नोटों की छपाई का काम 1860 में शुरू की थी। बैंक ऑफ इंग्लैंड के लिए कंपनी ने नए पॉलिमर नोट भी बनाए हैं। छोटे देशों के लिए नोटों की छपाई विदेशों में कराना तार्किक रूप से भी सही है। अगर किसी देश को कम नोट चाहिए तो इसके लिए प्रिटिंग प्रेस पर बड़ा खर्चा करना एक सही विकल्प नहीं है। इस तरह की प्रेसों में समय-समय पर नई और उच्च तकनीक का इस्तेमाल भी करना पड़ता है।
छोटे देशों के लिए बेहतर विकल्प
एक बैंकनोट प्रिंटर एक साल में एक अरब 40 करोड़ नोटों की छपाई करता है। अगर कोई केंद्रीय बैंक इससे कम नोटों की छपाई करता है तो प्रेस उसके लिए वित्तीय रूप से सही फैसला नहीं है। अमरीका की बात करें तो वह हर साल में सात अरब नोटों की छपाई करता है। सोलोमन द्वीप की बात करें तो यहां जनसंख्या छह लाख है और इसके लिए नोटों की छपाई डे ला रुए करता है। इसके अलावा मैसिडोनिया और बोत्सवाना जैसे देश भी ब्रितानी कंपनियों से नोटों की छपाई कराते हैं। भारत के संदर्भ में ऐसा करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से चिंता का कारण हो सकता है। खासकर भारत और चीन के बीच चल रहे मौजूदा सीमा विवाद के बीच ये और अहम हो जाता है। सवाल ये है कि क्या नोटों की बाहर छपाई से पैदा होने वाला डर सही है।
लीबिया की घटना और नकदी की किल्लत
लीबिया का उदाहरण लें तो साल 2011 में ब्रितानी सरकार ने 1.86 अरब दिनार को लीबिया भेजने से रोक दिया था। इसमें से 1.4 करोड़ पाउंड डे ला रुए ने छापे थे। नतीजा ये हुआ कि कर्नल गद्दाफी की सत्ता के आखिरी चरण में लीबिया में नोटों की किल्लत हो गई। ऐसी स्थिति में विदेशी सरकारें कभी-कभी नोटों का वितरण रोक देती है। हालांकि ये काफी दुर्लभ परिस्थिति है। लीबिया की इस घटना ने इंडस्ट्री को चौंकाया था। हालांकि नोटों की छपाई के इस व्यवसाय पर इसका खास असर नहीं पड़ा।
सैद्धांतिक रूप से देखें तो किसी देश से मिले छपाई के निर्देश से ज़्यादा मुद्रा की छपाई करके देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया जा सकता है। मुद्रा की अधिकता अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल सकती है और मुद्रास्फीति की स्थिति बन सकती है। एक दूसरा जोखिम ये भी रहता है कि विदेशी ताकतों को आपकी नोटों के सिक्योरिटी फीचर्स की जानकारी होती है। ऐसे में जाली नोटों का खतरा मंडराता रहता है। हालांकि इस तरह की घटना का कोई प्रमाण नहीं है।
जो देश अपनी मुद्रा की छपाई करते हैं वहां विश्वास एक बड़ा विषय होता है। ऐसे देशों में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार की भी आशंका रहती है। हालांकि ज्यादातर देश मुद्राओं की छपाई खुद करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा संघ की प्रबंधक गियामे लिपेक कहती हैं, ''ज्यादातर देश अपने बैंक नोट खुद छापते हैं और एक छोटा हिस्सा व्यवसायिक कंपनियों से छपवाते हैं।'' कोई भी अंतर्राष्ट्रीय नियामक इसतरह के उत्पादन को नियंत्रित नहीं करता है।
क्या भविष्य में कैश इतने जरूरी होंगे?
अब कई लोग कैश का अपेक्षाकृत कम इस्तेमाल करते हैं। कई एप्लिकेशन और भुगतान के तरीकों ने नोट का इस्तेमाल ना करना पहले से ज्यादा आसान किया है। चीन में वीचैट नाम का मैसेजिंग और पेमेंट एप्लिकेशन काफी लोकप्रिय है। चीन के पीपुल्स बैंक के मुताबिक साल 2016 में केवल 10 फीसदी रिटेल भुगतान कैश के जरिए किए गए। इसका बड़ा कारण था मोबाइल पेमेंट की संख्या में इजाफा।
इसके बावजूद इस क्षेत्र की जानकार स्मिदर्स पीरा कंपनी का मानना है कि बैंक नोट की मांग दुनियाभर में बढ़ रही है। साल दर साल 3.2 फीसदी की दर से ये मांग बढ़ रही है। मौजूदा वक्त में ये मांग 10 अरब डॉलर है। एशिया अफ्रीका नोटों की मांग के मामले में तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्र हैं।