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नहीं खरीद पाएंगे चॉकलेट, वजह जानकर कहीं सटक न जाए आपका दिमाग
जोवाना स्टेनिस्लेजेविच, बीबीसी कैप्टिल
Updated Mon, 01 Oct 2018 12:13 PM IST
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2050 के बाद चॉकलेट नहीं मिलेंगे! इस आशंका ने दुनिया भर के चॉकलेट प्रेमियों को चिंता में डाल दिया है। इस बारे में हजारों खबरें और लंबे-लंबे लेख छप चुके हैं कि हम चॉकलेट संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। चॉकलेट का ग्लोबल बाजार बढ़ता जा रहा है। अनुमान है कि 2025 तक चॉकलेट का बाजार 2015 के मुकाबले दोगुना हो जाएगा।
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चॉकलेट के नये बाजार
चॉकलेट से मुहब्बत के मामले में अब भी विकसित देश ही आगे हैं, लेकिन भविष्य में विकास की संभावनाएं कहीं और हैं। एक-एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देशों- भारत और चीन में चॉकलेट का बड़ा बाजार है और यह बढ़ रहा है। तेजी से होता शहरीकरण, उभरता हुआ मध्य वर्ग और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद ने इन दोनों देशों में चॉकलेट के लिए भूख बढ़ाई है।
भारत चॉकलेट के सबसे तेजी से उभरते बाजारों में से एक है। पिछले कई साल से यहां चॉकलेट की मांग लगातार बढ़ रही है। 2016 में भारत में 2 लाख 28 हजार टन चॉकलेट की खपत हुई जो 2011 के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा थी। मीठे के प्रति भारतीयों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। चॉकलेट को स्वाद उनको भा गया है। कुछ लोग इसे सेहत के लिए भी अच्छा समझते हैं।
चीन में 80 के दशक में हुए आर्थिक सुधारों से पहले चॉकलेट एक दुर्लभ चीज थी। खपत के मामले में चीन अब भी काफी पीछे है। यहां चॉकलेट की प्रति व्यक्ति सालाना खपत एक किलो से कम है। चीन में नये कॉफी कल्चर के उभार ने चॉकलेट के बाजार को बदल दिया है। संपन्न तबके के लाखों लोग बेहतर गुणवत्ता वाले विदेशी चॉकलेट्स की ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं। इस ट्रेंड ने अलीबाबा जैसे रिटेलर को भी अपना बिजनेस मॉडल बदलने पर मजबूर कर दिया है।
चॉकलेट से मुहब्बत के मामले में अब भी विकसित देश ही आगे हैं, लेकिन भविष्य में विकास की संभावनाएं कहीं और हैं। एक-एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देशों- भारत और चीन में चॉकलेट का बड़ा बाजार है और यह बढ़ रहा है। तेजी से होता शहरीकरण, उभरता हुआ मध्य वर्ग और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद ने इन दोनों देशों में चॉकलेट के लिए भूख बढ़ाई है।
भारत चॉकलेट के सबसे तेजी से उभरते बाजारों में से एक है। पिछले कई साल से यहां चॉकलेट की मांग लगातार बढ़ रही है। 2016 में भारत में 2 लाख 28 हजार टन चॉकलेट की खपत हुई जो 2011 के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा थी। मीठे के प्रति भारतीयों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। चॉकलेट को स्वाद उनको भा गया है। कुछ लोग इसे सेहत के लिए भी अच्छा समझते हैं।
चीन में 80 के दशक में हुए आर्थिक सुधारों से पहले चॉकलेट एक दुर्लभ चीज थी। खपत के मामले में चीन अब भी काफी पीछे है। यहां चॉकलेट की प्रति व्यक्ति सालाना खपत एक किलो से कम है। चीन में नये कॉफी कल्चर के उभार ने चॉकलेट के बाजार को बदल दिया है। संपन्न तबके के लाखों लोग बेहतर गुणवत्ता वाले विदेशी चॉकलेट्स की ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं। इस ट्रेंड ने अलीबाबा जैसे रिटेलर को भी अपना बिजनेस मॉडल बदलने पर मजबूर कर दिया है।
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खतरे में है चॉकलेट!
चॉकलेट बनाने के लिए जरूरी है कोको। कोको का पेड़ उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु में होता है। इसे वर्षा-वन के पेड़ों की छांव की जरूरत होती है। इसलिए इसका कृषि क्षेत्र सीमित है। कोको का उत्पादन मुख्य रूप से पश्चिमी अफ्रीका में होता है। इसके कुल उत्पादन का आधे से ज्यादा आइवरी कोस्ट और घाना में होता है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के असर से कोको का कृषि क्षेत्र सिमटता जा रहा है। इसके लिए जरूरी आर्द्रता और छांव बनाए रखना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है। जिन भौगोलिक भू-भागों में कोको के लिए अनुकूल जलवायु है, उनमें से कई इलाकों में खेती पर पाबंदी है। इससे कोको का क्षेत्र और सिमट जाता है।
चॉकलेट बनाने के लिए जरूरी है कोको। कोको का पेड़ उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु में होता है। इसे वर्षा-वन के पेड़ों की छांव की जरूरत होती है। इसलिए इसका कृषि क्षेत्र सीमित है। कोको का उत्पादन मुख्य रूप से पश्चिमी अफ्रीका में होता है। इसके कुल उत्पादन का आधे से ज्यादा आइवरी कोस्ट और घाना में होता है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के असर से कोको का कृषि क्षेत्र सिमटता जा रहा है। इसके लिए जरूरी आर्द्रता और छांव बनाए रखना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है। जिन भौगोलिक भू-भागों में कोको के लिए अनुकूल जलवायु है, उनमें से कई इलाकों में खेती पर पाबंदी है। इससे कोको का क्षेत्र और सिमट जाता है।
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पौधों को संक्रामक रोग
कोको का दुश्मन सिर्फ मौसम नहीं है। कुछ बीमारियां और कीड़े भी इसे नष्ट कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक पौधों को लगने वाली बीमारियों की वजह से हर साल 30 से 40 फीसदी कोको बर्बाद हो जाता है। आइवरी कोस्ट ने ऐलान किया कि वह एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगे कोको के पौधों को नष्ट करेगा, क्योंकि उनमें वायरस लग गए हैं। इन इलाकों में दोबारा पौधे लगाने में कम से कम पांच साल लगेंगे।
कोको में लगने वाला वायरस इसकी शाखाओं को फुला देता है। इससे उपज घट जाती है और फसल भी खराब हो जाती है। कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भी कोको के किसानों पर भारी पड़ रहा है। वे दूसरी फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिनकी खेती फायदेमंद है और आसान भी। इंडोनेशिया दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोको उत्पादक है। यहां भी 2010 से उत्पादन लगातार गिर रहा है। मौसम अनुकूल नहीं है। कोको के पेड़ पुराने हो रहे हैं। नतीजन, किसान मक्का, रबर और पाम ऑयल की खेती करने लगे हैं।
कोको का दुश्मन सिर्फ मौसम नहीं है। कुछ बीमारियां और कीड़े भी इसे नष्ट कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक पौधों को लगने वाली बीमारियों की वजह से हर साल 30 से 40 फीसदी कोको बर्बाद हो जाता है। आइवरी कोस्ट ने ऐलान किया कि वह एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लगे कोको के पौधों को नष्ट करेगा, क्योंकि उनमें वायरस लग गए हैं। इन इलाकों में दोबारा पौधे लगाने में कम से कम पांच साल लगेंगे।
कोको में लगने वाला वायरस इसकी शाखाओं को फुला देता है। इससे उपज घट जाती है और फसल भी खराब हो जाती है। कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव भी कोको के किसानों पर भारी पड़ रहा है। वे दूसरी फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिनकी खेती फायदेमंद है और आसान भी। इंडोनेशिया दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोको उत्पादक है। यहां भी 2010 से उत्पादन लगातार गिर रहा है। मौसम अनुकूल नहीं है। कोको के पेड़ पुराने हो रहे हैं। नतीजन, किसान मक्का, रबर और पाम ऑयल की खेती करने लगे हैं।
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कोको से नया प्यार
नये बाजारों की बढ़ती मांग और घटते उत्पादन के खतरे ने कोको उत्पादक देशों को चौकन्ना कर दिया है। घाना कोको का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। यह एशिया, खास तौर पर चीन को एक बड़े मौके के रूप में देखता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए घाना ने चीन के एक्जिम बैंक से डेढ़ अरब डॉलर का कर्ज लिया है।
मध्य पूर्व और अफ्रीका भी चॉकलेट उत्पादकों के लिए अहम हो रहा है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में चॉकलेट पर प्रति व्यक्ति खर्च क्षेत्रीय औसत से बहुत ज्यादा है। इन बाजारों के उपभोक्ता चॉकलेट को स्टेटस सिंबल के तौर पर देखते हैं, इसलिए यहां प्रीमियम ब्रांड की मांग बढ़ रही है। अल्जीरिया इस मामले में सबसे अलग है। यूरोमॉनिटर के मुताबिक अल्जीरिया के लोग चॉकलेट को एनर्जी बूस्टर के तौर पर खाते हैं। युवाओं में इनकी भरपूर खपत है, लेकिन यहां चॉकलेट को तोहफे में देने का चलन कम है।
नये बाजारों की बढ़ती मांग और घटते उत्पादन के खतरे ने कोको उत्पादक देशों को चौकन्ना कर दिया है। घाना कोको का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। यह एशिया, खास तौर पर चीन को एक बड़े मौके के रूप में देखता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए घाना ने चीन के एक्जिम बैंक से डेढ़ अरब डॉलर का कर्ज लिया है।
मध्य पूर्व और अफ्रीका भी चॉकलेट उत्पादकों के लिए अहम हो रहा है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में चॉकलेट पर प्रति व्यक्ति खर्च क्षेत्रीय औसत से बहुत ज्यादा है। इन बाजारों के उपभोक्ता चॉकलेट को स्टेटस सिंबल के तौर पर देखते हैं, इसलिए यहां प्रीमियम ब्रांड की मांग बढ़ रही है। अल्जीरिया इस मामले में सबसे अलग है। यूरोमॉनिटर के मुताबिक अल्जीरिया के लोग चॉकलेट को एनर्जी बूस्टर के तौर पर खाते हैं। युवाओं में इनकी भरपूर खपत है, लेकिन यहां चॉकलेट को तोहफे में देने का चलन कम है।